Monday, 27 July 2015

आप मेरे भीतर ईतना क्यों बसी हैं?

शायद मैं बस मैं नहीं हूँ,आप मेरे भीतर हर जगह हैं।
कुछ भी करता हूँ या करना चाहता हूँ तो सबसे पहले आपकि स्म्रिति आति है।
आपके बारे में हीं सोचने लगता हूँ।
आपके ढेर सारे डायलाॉग दिमाग में कौंधने लगते हैं।
आपकी कही बातें याद आनें लगती हैं।
आप मेरे अंदर ईतनी गहराई से क्युँ बसी हुई हैं?
मेरे हर व्यक्तिगत फैसलों के भीतर भी आप हीं क्युँ होती हैं?
मेरे हर बातों में आप हीं क्युः होती हैं?
आप अगर मेरे अंदर ईतना गहरा न रहती तो मैं भी औरों की तरह हीं रह जाता।
आप एक कठोर पित्रिस्त्तामक समाज से निकलने के बावजूद भी ईतनी आजाद कैसे हैं?
आप अपने अधिकारों को लूकर ईतनी सश्क्त कैसे हैं?
आप तो बेटा और बेटी के बीच के अंतर हीं नहीं जानती जो की आपके समय में सबसे पहले बताया जाता होगा।
आप तो दोनों को समान समझती हैं।
आपने अपने विचार को हमारे ऊपर कभी थोपने कि कोशीश हीं नहीं की।
मैं आपके भगवान का आपके सामने मजाक करता फिर भी आप कुछ न बोलती,आपका उस पत्थर में विश्वास बना रहता है।
पर मैं जानता हूँ कि उस पत्थर के सामने आप हमारे लिए हीं खङी होती हैं।
आप जो भी करती हैं वो हमारे लिए हीं करती हैं।

ईसलिए आप मेरे भीतर ईतनी गहराई से बसी हैं।
कभी सोचता हूँ कि मेरे भीतर आप अगर न होतीं तो मैं कैसा होता,पर ईसके आगे सोचते कि शक्ति हीं खत्म हो जाति है।

Saturday, 25 July 2015

अस्मिता को मत छेङिए मोदी जी।

सबसे पहले तो मैं माननीय प्रधानमंत्री मोदी जी का आभार प्रकट करना चाहता हूँ कि सभी लोगों की तरह आपको भी बिहार की याद आ हीं गयी भले वह चुनावी समर के हीं बहाने क्यों न आई हो।
ईसके लिए भी आपका आभारी हूँ की आपको अभी भी याद है की बिहार एक पीछङा राज्य है और इसे विकास कि सख्त जरूरत है।
हमारे पीछङेपन का याद दिलाने के लिए धन्यवाद।
हमें तो बस आपसे हीं विकास की आशा है।
ईसी तरह १४ महीने पर बिहार आते रहिये और विकास के लिए स्पेशल पैकेज का ऐलान करते रहिये।
माननीय मोदी जी आपको एक बात जानकर बहुत खुशी होगी,आफको पता है कि नहीं:-आपके भाषण से हीं हमारे बिहार का विकास हो जाता है।
आपके भाषण से हीं विकास की धारा निकलती है ना।
आपसे निवेदन है की अपने भाषण में थोङा और बल लगाकर ऊसको फेंकियेगा।
आप तो शायद न्युटन के तीसरे बल के नीयम को जानते हीं होंगे।
पर आपके विज्ञान के ज्ञान पर थोङा शक जरूर होता है जो कि लाजमी भी है।
आप तो ६० दीन में हीं विकास कर देते हैं पर हमारे बिहार में तो ६०साल में भी नहीं हो पाया।
खैर अब चिंता करने की बात नहीं है,अब आप जरूर विकास कर दोगे,आपके पास बात का जो जंजाल है।
पता नहीं आपके वैदिक वैज्ञानिकों ने कौन सा ऐसा यंत्र बना डाला जो ६० दीन में हीं विकास कर देता है।
ईसके लिए आपको उन महान संघी वैदिक वैज्ञानिकों के लिए नोबल पुरस्कार की समीक्षा करनी चाहिय।
नोबल पुरस्कार के बारे में तो आपको पता हीं होगा,पर फिर भी शक होता है मोदी जी जो की लाजमी है।
है कि नहीं?
खैर आपको तो बिहार कि जनता पर पूरा विश्वास हैं हीं,वो तो मुझे भी है।
आपको बिहार में बस २लोंगों पर नहीं है।
पर एक बात गौर करने लायक है।
बिहार के लोगों का तो डी.एन.ए हीं खराब है,और हाँ खराब डी.एन.ए का बहुत कम समय में हीं रीप्लिकेशन होता है जो कि शायद आप जानते हिं हैं।
सो जरा शतर्क रहने की जरुरत है।
है कि नहीं।

Tuesday, 12 May 2015

ऐ शहर बनारस।

Jo sahar jo mujhe sabse jaada apni ore kheechta hai wo Banaras hai.
Banaras padha jaane wala,likha jaane wala,kaha jaane wala,suna jaane wala or sabse jaada jiya jaane wala sahar.
Aajkal toh log ek-doosre se bass kaam ke liye milte hain.
Par Banaras me log Milne ke liye milte hain.
Saamajik ekta ko banaye rakhne wala sahar.
Purabiya prem ke prateek wala sahar.
Logon ko moksha dene wala sahar.
Hamare Bismillah khan kaa sahar.
Mandir
-Masjid kaa sahar.
Banarasi paan wala sahar.
Shankar ke damroo wala sahar.
Banaras se Patna bhi dikhta hai.
Khaati dehaati Majanua wala sahar.
Apnaapan sikhane wala sahar.
Isko dharam ke aadhar par nahin baata jaa Santa.
Aisi koshish karne walon ko Banarasiye log khader denge,yahi aasha hai.
Main apne Prem ko Banaras ke Assi chat or Lanka chat par dekhna chahta hoon,Ganga me dubki lagate hue.
Kya kucch nahi likha jaa chuka hai iss sahar ke baare me.
Phir bhi kucch likh diya.

ऐ माँ जरा खिसीआओ ना।

माँ का मिजाज सबसे ज्यादा तब खिसीआता है जब ऊ हमको फेसबुक पर लगी देखती है।
कहती है की मन करता है की इसको पटक दें।
माँ के शब्दों में:ई लईका दिनभर मोबाईल में लटकल रह हे,अब तोरा पङहाई लिखाई करल हो गेल ऊ।
मोबाईल के पीछे ई बिलोला रह हे।
उनका ईतना कहना की मेरा मोबाईल का टावरे जैसे भाग गया।
आज भी अगर गुस्सा जाती हैं तो मिजाज कठुआ जाता है।उन्होने हीं मूझे संघर्ष करना सिखाया,पढना सिखाया।वे हमेशा कहती हैं,पढाई हीं ऐसा है जो कभी व्यर्थ नहीं जाता है।
कभी कभी मनमुटाव भी हो जाता है
अपने जीवन में पहली महिला देखा जिनहोने अपने बच्चों को जातपात और धरम करम की बातें  नहीं सिखाई,शायद उनहीं के कारण आज नास्तिक हूँ।
भूमिहार होते हुए भी जात पात के मसलों पर हमेशा अपना विचार रखने वाली महिला।

Sunday, 19 April 2015

जब पापा ने आखिरी बार डाँटा था।

अक्सर हाई स्कूल लेवल तक लोग अपने पैरेन्टस से पढने लिखने के लिए हीं डाँट फटकार खाते हैं।
पर पढाई लिखाई वाले मामले में मैं स्वयं जागरूक रहा हूँ।
दसवीं में फ्रैक टिकल में साईंस की परीक्षा थी,पर मैंने अपनी काँपी हीं पूरी नहीं की और उस अधूरी काँ पी को हीं जमा कर दीया।
और मेरी प्रैकटीकल जो लेने वाले थे,वो हमारे स्कूल के सबसे अच्छे और मेरे आदर्नीय बायोलाँजी के चौधरी सर।
मेरा कलेजा मूँ ह में था।
सर ने तो कङी फटकार लगाई हीं और मामले को सीधे पापा तक रसीद कर दीया जो की उसी स्कूल में शिक्षक हैं।
मैं स्कूल से घर पहले आ गया था और मन हीं मन अनेक दुआएँ माँग रहा था जो कि उस व क्त स्वभाविक था।
पापा भी आ गये।
दरवाजा खोलते हीं वो मेरे ऊपर तूफान की तरह बरस पङे।
नालायक और ना जाने क् या क्या कहे।
पर उस घटना ने मूझे निखारने का काम  किया।
आप दोनों का शुक्रीया।
खैर मैंने कभी भी पापा के होने का फायदा लेने की कोशिश नहीं कि,फायदा तो दूर की बात है ऐसे खयाल तक नहीं आये कभी भी मन में।
यहाँ तक की बारहवीं में जहाँ मेरा सेन्टर था वहाँ जाने से पापा को मना कर दिया था।
हमेशा एक साधारण छात्र की तरह रहकर पढाई की बिल्कुल सबसे अनजान बनकर।

Saturday, 18 April 2015

जे ठ

तपता तो जेठ का महीना है।
का पंखा का कुलर सब उसके आ गे नत्मस्तक हो जाते हैँ।
जेठ के रौब के आगे ए.सी भी फेल है।
जेठ की दोपहरी मे दही,भात और आम खाकर जो नशीली निंद आती है उसकी कोई तुलना नहीं है।
गांव जेवार में जेठ एकदम अलग किस्म का होता है।
कोई सार्व जनिक दालान में गांव भर के लोगों का मजौ डा।
ईत ने में फला ने भ ईया आके बोले की चल तनी ताश हो जाए।
जादे हुआ त बाबा बोले की जा हो तनी बेल के खूब मीठा शरबत ले आव।
बेल के शरबत पीके सबके मीजा ज टंच।
गर्मी की छुट्टियों में पहले गांव जाता था।
ईध र क ई सालों से नहीं गया।
अब कालेज में आ गया,फीर भी यादें दील में बसी हैं और रहेंगी भी।
हे जेठ तुमको मेरा सलाम।

Saturday, 4 April 2015

Kya khabar hai

Kya khabar hai,paper kaisa aaya tha?
Badhiyaa gaya naa.
Haan badhiyaa gaya,lekin physics thora tough tha,itne me bagal wala bolta hai ki Maths bhi tough tha.
Arre bhai tough rahegaa nahin,engineering kaa exam hai,aise hee engineer ban jaaoge,bagal me se ek uncle bolte hain.
Ohh,do aata hua question galat kar diye,isse rank par bahut pharak par jaaega ki.
Itne me ghar pahuchate hain,sablog haal-chaal lete hain.
Abb answer milaane kaa tension.
Raat ko neend nahin aai.
Abb result kaa intezaar.
Badhiyaa rank aa paaegaa ki nahin.

Arre bhai apne aap ko inn 3hours se kyun judge karte ho,ye 3hour tumhaari zindagi nahin hai,zindagi bahut hai,exams ke bahut aage bhi zindagi hai.
Tension kaahe lete ho.
Tension free raho naa.
Abb khoob aaram se so jaao naa.
Thori kahaniyaan padh lo.
Thori music sun lo naa.
Apne doston se thori baat karlo naa.
Apne maa-papa ke kareeb jaao naa.
Bhai bahut accha lagega,thori apni dil ki bhi sun lo naa.