Sunday, 19 April 2015

जब पापा ने आखिरी बार डाँटा था।

अक्सर हाई स्कूल लेवल तक लोग अपने पैरेन्टस से पढने लिखने के लिए हीं डाँट फटकार खाते हैं।
पर पढाई लिखाई वाले मामले में मैं स्वयं जागरूक रहा हूँ।
दसवीं में फ्रैक टिकल में साईंस की परीक्षा थी,पर मैंने अपनी काँपी हीं पूरी नहीं की और उस अधूरी काँ पी को हीं जमा कर दीया।
और मेरी प्रैकटीकल जो लेने वाले थे,वो हमारे स्कूल के सबसे अच्छे और मेरे आदर्नीय बायोलाँजी के चौधरी सर।
मेरा कलेजा मूँ ह में था।
सर ने तो कङी फटकार लगाई हीं और मामले को सीधे पापा तक रसीद कर दीया जो की उसी स्कूल में शिक्षक हैं।
मैं स्कूल से घर पहले आ गया था और मन हीं मन अनेक दुआएँ माँग रहा था जो कि उस व क्त स्वभाविक था।
पापा भी आ गये।
दरवाजा खोलते हीं वो मेरे ऊपर तूफान की तरह बरस पङे।
नालायक और ना जाने क् या क्या कहे।
पर उस घटना ने मूझे निखारने का काम  किया।
आप दोनों का शुक्रीया।
खैर मैंने कभी भी पापा के होने का फायदा लेने की कोशिश नहीं कि,फायदा तो दूर की बात है ऐसे खयाल तक नहीं आये कभी भी मन में।
यहाँ तक की बारहवीं में जहाँ मेरा सेन्टर था वहाँ जाने से पापा को मना कर दिया था।
हमेशा एक साधारण छात्र की तरह रहकर पढाई की बिल्कुल सबसे अनजान बनकर।

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