तपता तो जेठ का महीना है।
का पंखा का कुलर सब उसके आ गे नत्मस्तक हो जाते हैँ।
जेठ के रौब के आगे ए.सी भी फेल है।
जेठ की दोपहरी मे दही,भात और आम खाकर जो नशीली निंद आती है उसकी कोई तुलना नहीं है।
गांव जेवार में जेठ एकदम अलग किस्म का होता है।
कोई सार्व जनिक दालान में गांव भर के लोगों का मजौ डा।
ईत ने में फला ने भ ईया आके बोले की चल तनी ताश हो जाए।
जादे हुआ त बाबा बोले की जा हो तनी बेल के खूब मीठा शरबत ले आव।
बेल के शरबत पीके सबके मीजा ज टंच।
गर्मी की छुट्टियों में पहले गांव जाता था।
ईध र क ई सालों से नहीं गया।
अब कालेज में आ गया,फीर भी यादें दील में बसी हैं और रहेंगी भी।
हे जेठ तुमको मेरा सलाम।
Saturday, 18 April 2015
जे ठ
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