माँ का मिजाज सबसे ज्यादा तब खिसीआता है जब ऊ हमको फेसबुक पर लगी देखती है।
कहती है की मन करता है की इसको पटक दें।
माँ के शब्दों में:ई लईका दिनभर मोबाईल में लटकल रह हे,अब तोरा पङहाई लिखाई करल हो गेल ऊ।
मोबाईल के पीछे ई बिलोला रह हे।
उनका ईतना कहना की मेरा मोबाईल का टावरे जैसे भाग गया।
आज भी अगर गुस्सा जाती हैं तो मिजाज कठुआ जाता है।उन्होने हीं मूझे संघर्ष करना सिखाया,पढना सिखाया।वे हमेशा कहती हैं,पढाई हीं ऐसा है जो कभी व्यर्थ नहीं जाता है।
कभी कभी मनमुटाव भी हो जाता है
अपने जीवन में पहली महिला देखा जिनहोने अपने बच्चों को जातपात और धरम करम की बातें नहीं सिखाई,शायद उनहीं के कारण आज नास्तिक हूँ।
भूमिहार होते हुए भी जात पात के मसलों पर हमेशा अपना विचार रखने वाली महिला।
Tuesday, 12 May 2015
ऐ माँ जरा खिसीआओ ना।
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