जब भी गाँव जाता हूँ तो जितने लोग मिलते हैं,सब लोग हालचाल पूछते हैं,जिंदगी के रहस्यों पर से पर्दा हटाने की कोशीश तक कर देते हैं।
पर जब गाँव से शहर आता हूँ तो कोई देखकर भी नहीं देखता,कोई सुनकर भी अनसुना कर देता है।
गाँव जाकर कितना अच्छा लगता है जब सारे लोग ईक्वेसन आँफ अ फैमिली औफ स्ट्रेट लाईन और सर्कल्स टाईप का फिल देते हैं।
गाँव के लोगों का हमेशा स्केलर और टेंसर बना रहना कितना फिल देता है।वेक्टर तो हमें उलझन हीं देता रहा है।
वहीं शहर आने पर वेरीयेबल क्युबीक ईक्वेसन टाईप का हो जाना,अपने आप में सिमटकर बस अपना हो जाना।जिंदगी को क्लासीकल प्रोबैबिलिटी टाईप का जीने लग जाना।
लोगों से टैंजेंट टाईप से मिलना।कितना अच्छा लगता है अपने लोगों से परपेंडीकुलर टाईप मिलना।पर पता हीं नहीं चला की जिंदगी में ये टैंजेंट कब आ गया।हम तो सर्कल ठहरकर किसी दूसरे का ईंतजार करते ठहरते हैं।टैंजेंट तुम मुझे बिल्कुल अच्छे नहीं लगते।
गाँव मुझे पता हीं नहीं चला की कब तोहरे और हमरे बिच के ग्रेविटि का रिश्ता डेफिनिट ईंटिग्रल विद पोजिटीव स्लोप में बदल गया।
तुमको शायद पता नहीं है शहर मैं तुम्हारे हर कोने में ईंटिग्रेसन का सूत्र लिये फिरता चलता हूँ।
तुमको हर ऐंगल से देखना चाहता हूँ।
तुम हीं तो ऐंगल औफ एलिवेसन और डिप्रेसन कि याद को जेहन मे बार-बार ला देते हो।
अब कितना लिखे,तुम्हारे बारे में पहले हीं बहुत लोग बहुत कुछ लिख चुके हैं।
फिर भी मैं गाँव को अपने अंदर लेकर शहर को खोजना चाहता हूँ,शहर की हर गलियों में एक नये गाँव को देखता हूँ।मेरे लिए मेरे गाँव को भूलने का मतलब है अपने अस्तित्व को भूल जाना,अपनी उन पीढीयों को भूल जाना जिन्होंने न जाने कितने कष्ट और मेहनत करके हमारे लिए जमीन को सींचा है।
पर ए-शहर मैं तुमसे भी ईश्क करना चाहता हूँ वही अंदाज में।
Commendable job!
ReplyDeleteThanks sir
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