कितना बेवजह लगता है कभी-कभी सबकुछ।
जैसे ये लिखना,ये काम करना,ये क्लास जाना
सबकुछ बेवजह लगने लगता है।
सोचना होता है की ये चीजें क्यों कर रहा हूँ,कहीं बेवजह तो नहीं कर रहा हूँ।
बहुत बार तो ये वजह और बेवजह में क ई दिनों तक फँसे रहना,फिर निष्कर्ष निकालना की ये फँसना भी कितना बेवजह था।
ये जो लिख रहा हूँ,ये भी तो बहुत बेवजह हीं है ना,इससे क्या होने वाला है,इसको कौन पढेगा,इसको कौन देखेगा।
पता होते हुए भी बेवजह को हीं करना उसको एक मुका़म देता है।कितना अच्छा लगता है कभी-कभी बेमकसद के कामों को भी करना,ये भी तो सुकून के पल दे जाते हैं।बेवजह में हीं अधिक रस होता है जैसे की बेरोजगारी में हीं कोई भी अधिक प्रयास करता है।
कितना अच्छा लगता है बहुत दिनों तक कुछ न करना,सोये रहना,अधिक हुआ तो दोस्तों के साथ घूम लेना बस।सबसे अधिक भाता है सोना हीं,इसमें हीं तो बिना टेंशन के बेसकिमती निंद का मिजाज पता चलता है।
सबकुछ बेवजह हीं है,पर सब के साथ एक वजह दौङ लगाते रहता है।पता होता है जब मैं रेत को अपने मुट्ठियों में कैद कर लेना चाहता हूँ,कि ये मिनट भर में भरभरा जायेगा।ठीक वैसे हीं पता होता है की हमें जागना है,निरंतर चलना हीं है,लोगों के साथ कमर कसकर दौङना हीं होगा।
फिर भी सोना हीं अच्छा लगता है,बेवजह हीं बेशक।
बहुत दिनों तक किसी के बारे में सोचते रहना।
किसी लङकी के बारे में,अगर वो होती तो ऐसा होता,ऐसा होता,फिर वैसा होता।वो संग होती,वो फिर संग होती,पर वो है हीं नहीं।फिर फेसबुक पर उसको मैसेज करना।फिर होना,फिर,फिर संग होना।
ये बेवजह हीं तो है।
क ई बार दोस्तों के सिगरेट पीने के आँफर को ठुकरा देना,फिर गालियाँ सूनना।फिर सोचना ये पीना भी कितना बेवजह हैं।
फिर जागना,फिर जीने लग जाना।कितना अच्छा लगता है ये बेवजह का संग होना।
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