Wednesday, 23 September 2015

मेरा शहर

मैं हर चीज को अपने अनुसार देखने की कोशीश करता हूँ।किसी से बहुत जल्द प्रभावित भी नहीं होता।हर बात को हर कोने से देखने कि कोशीश करता हूँ।मेरे भीतर भी बहुत कमियाँ हैं।अनुभव कि भी कमी है।पर मैं अपने शहर से ईतना प्यार करता हूँ कि उस शहर में मूझे कुछ कमियाँ हीं नहीं नजर आती हैं।मैं अपने शहर को हर वक्त अपने अंदर जिंदा रखता हूँ।मैं हर शहर की तुलना अपनेशहर से करता हूँ। मैं हर शहर के भीतर एक अपना शहर बना लेता हूँ और उसी शहर में जीने लगता हूँ।मेरे लिए मेरा शहर बस एक शहर नहीं होता है,शहर यादों का एक खजाना होता है।मैं अपने यादों को अपने शहर में समेटे चलता हूँ।कभि कभि ये यादें हीं तो जिंदगी की अंतीम संगिनी रह  जाते है।लोग तो समय के साथ साथ छोङते चले जाते हैं पर ये शहर की यादें हीं तो हमें ऐसे वक्त में भी एक सहारा देती हैं।हमें नये लोगों से दिदार भी तो शहर में हीं होता है।पर लोग नये कहाँ मिलते हैं।नये लोग भी तो शहर के रेलमपेल भीङ का हिस्सा हीं होते हैं।पर भीङ में से हीं कुछ लोग बहुत करीब आ जाते हैं।हमें ईश्क भी तो शहर में हीं होता है।बिन शहर ईश्क कैसा।ईसलिए मैं अपने शहर को अपने भीतर संजोये रखता हूँ।

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