ट्रेन चल रही है,चारो तरफ अंधेरा हीं है,बस कोई है तो वह ट्रेन की छूक-छूक की आवाज और अंधेरे में तारों से जगमगाता अनंत आकाश।
इस समय मैं बिल्कुल खाली हूँ,बिना कुछ सोचे अनंत आकाश को पीछे छोङते ट्रेन में बैठा सफर कर रहा हूँ।
जब करने को कुछ न हो तो मन एक जगह शांत नहीं रहता,ये चंचल मन।
कभी आरा कभी पटना टाईप्ड की फिलिंग्स आ रही है।कभी मन पटना वाला पुराना डेरा टाईप्ड महसूस कर रहा है।कुछ न होते हुए भी उस डेरा में कितना कुछ था,बाबा केे रोज के संघर्ष कि कहानी,पापा के संघर्ष की कही-सूनी हुई बाते जो की हमें अक्सर हीं दादी सुनाया करती थी या कहें तो बताया करती थी।कुछ न था वहाँ अच्छा,पर दो भाई थे वहाँ,उनकी एक बङी बहन थी वहाँ और इन सबों के बीच था कभी न खत्म होने वाला उनलोगों के बीच का प्यार।छोटा भाई और बहन अक्सर हीं लङते,रोज हीं कहीए तो,पर कुछ देर बाद हीं कन्क्लूजन निकलता कि गलती किसी की नही थी।तो फिर लङे क्यों,क्या पता,शायद मन कर दिया होगा बगावत करने का।दोनों के बीच उम्र का फासला 12 साल का था ।
बिना टेंशन का जीना था वहाँ,बिना जमाने का परवाह किये,जो की मैं आज भी नहीं करता।
कब सुबह,कब दोपहर,कम शाम क्या पता,फासला हीं नहीं पता चलता था।
शाम को किताब खोलकर बैठ गया,पर अभी अच्छी तरह पालथी जमाई नहीं कि मन में सवाल आने लगे-बाबा 15 मिनट में आ हीं रहे होंगे कुछ खाने-पीने का समान लेकर।बाबा आये नहीं कि हमारी पढाई समाप्त।
पापा को पटना वाले डेरा पर आये कभी कभार महीने भी हो जाते,बहुत समय होने पर संडे के दिन मन पापा का भी बेसब्री से ईंतजार करता रहता।पापा एक दिन,दिन क्या कुछ घंटे के लिए भी आते तो प्रिपोजिसन,कनेक्टर्स और सब्जेक्ट भर्ब एंड ऐग्रीमेंट का महत्व बताकर हीं जाते,वही 6.30 वाली सटलवा से।
माँ मेरी सबसे करीब रही है,मेरी आँखों की नूर रही है बचपन से हीं।धङाम-धुङूम,कूद-फांद करता लेकिन हर घंटे माँ को देखने जरूर आता।सबसे अच्छा वो पल होता था जब गाँव माँ के पास जाना होता था,बाबा के पास।
सबकुछ था पटना वाला डेरा में भाई,बहन,लङाई,प्यार,संघर्ष,बिना टेंशन की जिंदगी और भी बहुत कुछ।सपने भी थे मेरे,सपनों ने जन्म लेना उस डेरा में हीं शुरू किया।सपने छोटे थे उस वक्त जैसे डी.ए.वी में पढने के सपने थे,सपने थे की मैं भी स्कूल बङी बस में बैठकर जाऊँ।
ऐसे हीं थे हमारे सपने।
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