एक रात मुझे भी सपने ने कैद कर रखा था।
न कुछ बोलता न कुछ बोलने देता।
बस टकटकी लगाकर देखे जा रहा था।
सपने में तुम कितनी पास खङी थी।
जी कर रहा था तुमको छू लूँ।
सपने में तुम्हारा घर कितना नजदीक लग रहा था।
सपने में ही तुम अपने कोठे पर हँसते हुए मिली थी।
सपने मे हीं हम एक दूसरे से बातें कर रहे थे जो शायद कभी हुई हीं ना हो।
सपने में एक धागा आया था,धागे के उस पार तुम थी और इस तरफ मैं।
मैं उस धागे के सहारे ही तुम तक जाने कि धून में था।
तुमसे ढेरो बातें करना चाहता था।
तुमसे कुछ कहना चाहता था जो शायद कभी न कह सका।
ढेरो ख्वाब थे सपने में।
पर जैसे जैसे रात ढली ये सपने भी बिखरने लगे
कहीं दूर जाने लगे।
मैने रोका पर रोक न सका।
बहुत दूर चले ग ए।
Thursday, 27 August 2015
सपने में कैद मैं।
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