तुम गरीब हो
तुम कमजोर हो
तुम अनपढ हो
तुम दुनिया से अनजान हो
तुम बेबस हो
तुम लाचार।
तुमहारे इतने होने के बावजुद तुमसे डरता हूँ।
तुमहारी परछाई के बारे में भी रात को सोचता हूँ तो मन सीहर जाता है।
हमने तुम्हें ताउम्र सताया है।
हमने तुम्हें कुछ भी करने से रोका है।
हमने तुम्हारी ईज्जत गिरवी रख दी।
तुम्हें अपने पैरो तले दबाया है।
हमने हीं तुम्हें नीचे गिराया है।
हाँ, हमें तुमसे डर लगता है,ऐसा डर जो हमें अंदर हीं अंदर सताता है।
ये डर हीं हमें मजबूर बनाता है।
हाँ मैं तुमसे डरता हूँ।
तुमने हमें एक काल्पनिक डर दे रखा है।
उस कल्पना के आगे हम सोच भी नहीं सकते।
कल्पना में हीं हमारे अस्तितव पर एक खतरा मंडराने लगता है।
हाँ मैं तुमसे डरता हूँ क्यूँ कि तुम एक दलित हो।
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