Thursday, 27 August 2015

ईंतजार।

क्या पता कभी-कभी मन कहाँ चला जाता है।

मुझसे शायद बहुत दुर।
कहाँ?
ये मुझे भीं नहीं पता।
मन न जाने किसका ईंतजार करने लगता है।
शायद किसी ऐसे का जिसका ईंतजार जो कभी खत्म ना हो।उसका जो शायद कभी भी ना मिल सके।
उसका जो शायद बहुत दुर है।
उनका ईंतजार करना जो कभी ना आएंगे,कितना कष्ट देता है।ऐसे लोगों का ईंतजार करना शायद अपने आप से बेईमानी है,पर मन फिर भी ऐसे लोगों का हीं क्यूँ ईंतजार करता है।
कुछ लोग जो बहुत दुर हैं,कभी देखे न ग ए हों सालों से पर फिर भी मन ऐसे लोगों का व्याकुलता से क्यूँ ईंतजार करने लगता है?
कुछ लोग बहुत कम समय में हीं समय के सीमा को पारकर आपके बहुत करीब आ जाते हैं, बहुत दुर होते हुए भी और शायद फिर शुरू होता है कभी न खत्म होने वाला ईंतजार।
हम ईंतजार क्यूँ करते है?
ये सवाल मैं अपने आप से क्यूँ पूछ रहा हूँ।
मैं भी तो कभी कभी ये ईंतजार का हीं सहारा लेता हूँ।
ईंतजार में मन किसी एक को हीं व्याकूल होकर क्यूँ याद करने लग जाता है?
ईस लाईलाज बिमारी का कुछ तो नाम होगा ना?

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