आदमी अकेला होने पर आज के समय में क्या करता है?
शायद सभी लोगों के बारे में तो मैं नहीं बता सकता है,पर मैं तो अक्सर एक-दो चीजें हीं करता हूँ।
बहुत अकेलापन होने पर आजकल या तो गुलजार को पढने लगता हूँ नहीं तो फेसबुक या वाट्स ऐप में आनलाईन लोगों कि लिस्ट देखता हूँ।
फिर ऊन में से हीं किसी को हाय लिखकर ईनबाक्स कर देता हूँ।
ये हाय लिखना भर और ऊस तरफ से रीप्लाई आने भर के समय में आधा अकेलापन दूर हो जाता है।
अगर मूझे भी कोई हाय लिखकर भेजता है तो मैं बिना देर के समझ जाता हूँ कि वो आदमी या तो बहुत अकेला है या तो ऊसे बात करने कि जरूरत है।
कितना आराम देता है बस ये कुछ देर कि बात।
सारे थकान सारे तकलीफ सारे टेंशन को कुछ देर के लिए हीं सही दूर तो जरुर कर देता है।
पर क्या ये सोशल साईट्स से आप अपने अकेलापन को हमेशा के लिए दूर कर सकते हैं क्या?
मैं ना बोलता हूँ।
वर्चुअल दुनिया और वास्तविक दुनिया में काफी फर्क होता है।वर्चुअल दुनिया में किसी भी चीज का सही समाधान हैं ही नहीं।चीर काल समाधान के लिए हमें वास्तविकता कि तरफ मूङना हीं पङता है।
वर्चुअल दुनिया में अतिअधिक रम जाने के चलते कभी कभी तो मनोचिकित्सक का भी रूख करना पङ जाता है।
वर्चुअल दुनिया में अतिअधिक रहने पर हमारा वास्तविकता से कुछ हद तक नाता खत्म हो जाता है।
हम सारे लोगों को अपने फेसबुक चैट लिस्ट वाले लोगो कि तरह हीं समझने लगते हैं।
आज भी मूझे सबसे आराम तब मिलता है जब रात को घर से फोन का एक काँल आता है और माँ,भाई,दिदी और पापा से बात होती है।
वर्जुअल और वास्तविक दुनिया में ऊतना हीं अंतर है जितना किसी लेखक को आँनलाईन और ऊसी लेखक कि वही किताब हार्डकाँपी के रूप में पढने में।