Sunday, 30 August 2015

वास्तविकता और वर्चुअलिटी।

आदमी अकेला होने पर आज के समय में क्या करता है?
शायद सभी लोगों के बारे में तो मैं नहीं बता सकता है,पर मैं तो अक्सर एक-दो चीजें हीं करता हूँ।
बहुत अकेलापन होने पर आजकल या तो गुलजार को पढने लगता हूँ नहीं तो फेसबुक या वाट्स ऐप में आनलाईन लोगों कि लिस्ट देखता हूँ।
फिर ऊन में से हीं किसी को हाय लिखकर ईनबाक्स कर देता हूँ।
ये हाय लिखना भर और ऊस तरफ से रीप्लाई आने भर के समय में आधा अकेलापन दूर हो जाता है।
अगर मूझे भी कोई हाय लिखकर भेजता है तो मैं बिना देर के समझ जाता हूँ कि वो आदमी या तो बहुत अकेला है या तो ऊसे बात करने कि जरूरत है।
कितना आराम देता है बस ये कुछ देर कि बात।
सारे थकान सारे तकलीफ सारे टेंशन को कुछ देर के लिए हीं सही दूर तो जरुर कर देता है।

पर क्या ये सोशल साईट्स से आप अपने अकेलापन को हमेशा के लिए दूर कर सकते हैं क्या?
मैं ना बोलता हूँ।
वर्चुअल दुनिया और वास्तविक दुनिया में काफी फर्क होता है।वर्चुअल दुनिया में किसी भी चीज का सही समाधान हैं ही नहीं।चीर काल समाधान के लिए हमें वास्तविकता कि तरफ मूङना हीं पङता है।
वर्चुअल दुनिया में अतिअधिक रम जाने के चलते कभी कभी तो मनोचिकित्सक का भी रूख करना पङ जाता है।
वर्चुअल दुनिया में अतिअधिक रहने पर हमारा वास्तविकता से कुछ हद तक नाता खत्म हो जाता है।
हम सारे लोगों को अपने फेसबुक चैट लिस्ट वाले लोगो कि तरह हीं समझने लगते हैं।

आज भी मूझे सबसे आराम तब मिलता है जब रात को घर से फोन का एक काँल आता है और माँ,भाई,दिदी और पापा से बात होती है।

वर्जुअल और वास्तविक दुनिया में ऊतना हीं अंतर है जितना किसी लेखक को आँनलाईन और ऊसी लेखक कि वही किताब हार्डकाँपी के रूप में पढने में।

Thursday, 27 August 2015

सपने में कैद मैं।

एक रात मुझे भी सपने  ने कैद कर रखा था।
न कुछ बोलता न कुछ बोलने देता।
बस टकटकी लगाकर देखे जा रहा था।
सपने में तुम कितनी पास खङी थी।
जी कर रहा था तुमको छू लूँ।
सपने में तुम्हारा घर कितना नजदीक लग रहा था।
सपने में ही तुम अपने कोठे पर हँसते हुए मिली थी।
सपने मे हीं हम एक दूसरे से बातें कर रहे थे जो शायद कभी हुई हीं ना हो।
सपने में एक धागा आया था,धागे के उस पार तुम थी और इस तरफ मैं।
मैं उस धागे के सहारे ही तुम तक जाने कि धून में था।
तुमसे ढेरो बातें करना चाहता था।
तुमसे कुछ कहना चाहता था जो शायद कभी न कह सका।
ढेरो ख्वाब थे सपने में।
पर जैसे जैसे रात ढली ये सपने भी बिखरने लगे
कहीं दूर जाने लगे।
मैने रोका पर रोक न सका।
बहुत दूर चले ग ए।

ईंतजार।

क्या पता कभी-कभी मन कहाँ चला जाता है।

मुझसे शायद बहुत दुर।
कहाँ?
ये मुझे भीं नहीं पता।
मन न जाने किसका ईंतजार करने लगता है।
शायद किसी ऐसे का जिसका ईंतजार जो कभी खत्म ना हो।उसका जो शायद कभी भी ना मिल सके।
उसका जो शायद बहुत दुर है।
उनका ईंतजार करना जो कभी ना आएंगे,कितना कष्ट देता है।ऐसे लोगों का ईंतजार करना शायद अपने आप से बेईमानी है,पर मन फिर भी ऐसे लोगों का हीं क्यूँ ईंतजार करता है।
कुछ लोग जो बहुत दुर हैं,कभी देखे न ग ए हों सालों से पर फिर भी मन ऐसे लोगों का व्याकुलता से क्यूँ ईंतजार करने लगता है?
कुछ लोग बहुत कम समय में हीं समय के सीमा को पारकर आपके बहुत करीब आ जाते हैं, बहुत दुर होते हुए भी और शायद फिर शुरू होता है कभी न खत्म होने वाला ईंतजार।
हम ईंतजार क्यूँ करते है?
ये सवाल मैं अपने आप से क्यूँ पूछ रहा हूँ।
मैं भी तो कभी कभी ये ईंतजार का हीं सहारा लेता हूँ।
ईंतजार में मन किसी एक को हीं व्याकूल होकर क्यूँ याद करने लग जाता है?
ईस लाईलाज बिमारी का कुछ तो नाम होगा ना?

Sunday, 16 August 2015

ईंतजार।

क्या पता कभी-कभी मन कहाँ चला जाता है।

मुझसे शायद बहुत दुर।
कहाँ?
ये मुझे भीं नहीं पता।
मन न जाने किसका ईंतजार करने लगता है।
शायद किसी ऐसे का जिसका ईंतजार जो कभी खत्म ना हो।उसका जो शायद कभी भी ना मिल सके।
उसका जो शायद बहुत दुर है।
उनका ईंतजार करना जो कभी ना आएंगे,कितना कष्ट देता है।ऐसे लोगों का ईंतजार करना शायद अपने आप से बेईमानी है,पर मन फिर भी ऐसे लोगों का हीं क्यूँ ईंतजार करता है।
कुछ लोग जो बहुत दुर हैं,कभी देखे न ग ए हों सालों से पर फिर भी मन ऐसे लोगों का व्याकुलता से क्यूँ ईंतजार करने लगता है?
कुछ लोग बहुत कम समय में हीं समय के सीमा को पारकर आपके बहुत करीब आ जाते हैं, बहुत दुर होते हुए भी और शायद फिर शुरू होता है कभी न खत्म होने वाला ईंतजार।
हम ईंतजार क्यूँ करते है?
ये सवाल मैं अपने आप से क्यूँ पूछ रहा हूँ।
मैं भी तो कभी कभी ये ईंतजार का हीं सहारा लेता हूँ।
ईंतजार में मन किसी एक को हीं व्याकूल होकर क्यूँ याद करने लग जाता है?
ईस लाईलाज बिमारी का कुछ तो नाम होगा ना?

Saturday, 15 August 2015

राखी और दिदी।

माँ तो बस एक हीं होती है,पर मेरी एक और माँ है। बिल्कुल माँ कि तरह हीं प्यार करती हैं,माँ से अधिक ख्याल रखती हैं।मेरा बचपन उनके साथ हीं कटा
मैं अपनी दिदी कि बात कर रहा हूँ।कुछ दिन पहले उनका फोन आया था, पूछ रहीं थी कि रायपुर राखि भेज देते हैं।मैं कुछ भी बोलने की दशा में नहीं था।शायद वो मेरी चुप्पी को परख लीं।
दिदी के बिना यह मेरी दुसरी राखी होगी।शायद आनेवाले समय में यह अंतराल और बढेगा हीं
राखि के कारन हीं पहलेसकि क ईं बातें मन में कौंधने लगीं है।आप कितनी तैयारियाँ करतीं थीं राखि को लेकर।दिल में जो बातें कहीं खो सी ग ईं थीं आज फिर से याद आ रहीं हैं।
ये भाई-बहन का प्रेम हीं तो है जिसके कारन ईतनी दुर बैठा आपको याद कर रहा हूँ।
आप मुझसे ११ साल बङी होने के बाद भी जो लङाईयाँ करती थीं आज मन को एकाएक खुशी दे रहीं हैं।हमलोगों कि लङाईयाँ रिश्तेदारों के यहाँ भी मशहूर हैं।
आपको याद होगा कि कैसे पापा भी हमारे बिच में  होने वाली लङाईयों से अजीज आ जाते थे।आपके कारन हीं पापा मुझे क ई बार अपना बङा वाला ऊपहार दे देते थे।
सबसे अधिक परेशान तो माँ होती थीं।हमें एक-दुसरे से न बोलने का सौगंध तक दे देती थीं।
उसके बाद जब आप रोती थीं तो मुझे बङा आनंद मिलता था।भ ईया हमारी बातों को कैसे चुपचाप देखता था।
आपको याद करके पटना वाला डेरा याद आ गया।कैसे बिजली चले जाने पर आप रात भर जगकर पंखा झालती थीं।आपको जो कुछ भी मिलता था उसमें एक हिस्सा मेरा भी होता था और आप कहती थीं-बाबु के लिए रख दे रहें हैं,आएगा तो खा लेगा।
मेरा बचपन तो आपके साथ हीं बीता।माँ तो कभी-कभी हीं पटना आती थीं।
आपने माँ के दुर होने का एहसास कभी नहीं होने दिया।
लोग कहते भी थे-कितना प्रेम से तिनों भाई बहन रहते हैं।
घर में लोग मुझे मयफट समझते हैं।
पर आपकी बिदाई के दिन सबसे अधिक मैं हीं रोया था,ईतना अधिक कि आप चुप होकर मुझे चुप कराने लग ग ईं थीं।
आपके बिदाई के कुछ दिनों बाद तक ऐसा लगता था कि किसी ने हमसे मेरे सबसे अनमोल चिज को छीन लिया।
आज भी पटना या आरा जाता हूँ तो माँ के बाद सबसे पहले आपको हीं देखने जाना चाहता हूँ।
अब तो छुटकी भी मिलने का बहाना हो ग ई है।
आपने मुझे जितना प्यार दिया है ऊतना शायद हीं मैं आपको दे सकूँ पर कोशीश जरूर करूँगा।
हमारे बीच में राखी का प्यार ईसी तरह बना रहे।

Tuesday, 11 August 2015

एक दिन बस्तर में।

बस्तर में एक अजीब सी शांति देखने को मिलती है।
मुझे बस्तर जाकर एक अजीब सा आराम मिला
मुख्यभारत के शहरों से बिल्कुल अलग है बस्तर।
अपने आप में एक सुनापन लिए।

किसी को भी नहीं पता रहता कि ये अजीब सी शांति ना जाने कब गोलियों कि तङतङाहट में बदल जाए।
एक दिन में हीं काफी कुछ देखने और सीखने को मिला।

Wednesday, 5 August 2015

अनचाहा डर

तुम गरीब हो
तुम कमजोर हो
तुम अनपढ हो
तुम दुनिया से अनजान हो
तुम बेबस हो
तुम लाचार।

तुमहारे तने होने के बावजुद तुमसे डरता हूँ।
तुमहारी परछाई के बारे में भी रात को सोचता हूँ तो मन सीहर जाता है।
हमने तुम्हें ताउम्र सताया है।
हमने तुम्हें कुछ भी करने से रोका है।
हमने तुम्हारी ईज्जत गिरवी रख दी।
तुम्हें अपने पैरो तले दबाया है।
हमने हीं तुम्हें नीचे गिराया है।

हाँ, हमें तुमसे डर लगता है,ऐसा डर जो हमें अंदर हीं अंदर सताता है।
ये डर हीं हमें मजबूर बनाता है।
हाँ मैं तुमसे डरता हूँ।

तुमने हमें एक काल्पनिक डर दे रखा है।
उस कल्पना के आगे हम सोच भी नहीं सकते।
कल्पना में हीं हमारे अस्तितव पर एक खतरा मंडराने लगता है।
हाँ मैं तुमसे डरता हूँ क्यूँ कि तुम एक दलित हो।

Sunday, 2 August 2015

अरमां असंख्य

कितने सपने हैं,कितने अरमां हैं
शायद असंख्य,अनगीनत।
काश कोई अरमानों में पंख लगा देता
शायद कोई तरकी़ब सीखा देता।
शायद सारे अरमां यथार्थ में तब्दील हो जात
शायद सारे अरमां जीवन को एक नया ऊजाला दे देता।
मेरे अरमां असंख्य,अनगीनत हैं
शायद कोई तो अरमानों में पंख लगा देता।