Sunday, 13 March 2016

पुराने कपल्स मिक्स अप.

#1
हमारी शादी को 35 साल हो गये,इस शहर में रहते 20 साल हो गये।
पर आजतक तुम मुझे शाँपिंग कराने नहीं ले गये।
अरे कुमुद तुम भी न,कहाँ से कहाँ बात को खिंच देती हो,मैं ही तो तुम्हारा शाँप हूँ जिसमें तू 35साल से शाँपिंग कर रही हो।
अरे कमल,बात को बदलना तो कोई तुमसे सीखे,और तुम मुझ पर बात बदलने का नाहक ही ईल्ज़ाम लगाते हो।तुम आज भी न बहुत ओल्ड एज वाला सोच रखते हो,माँल नही जाना चाहते हो।
अरे कुमुद ओल्ड दुनिया वालों के लिए हो जाऊँगा,पर तुम्हारे लिए तो 35साल पहले वाला डैसिंग कमल ही रहूँगा।
मुझे माँल से डर लगता है कुमुद,उस एक्सलेटर से भी,डर लगता है की कहीं उसमें मेरा पैर न फँस जाये।
तुम्हें पता है कुमुद मुझे डर लगता है माँल वाली सेल्फिश भीड़ से,मुझे डर लगता है वहाँ के हाँल्फ
हार्टेड चमक दमक से।और तुम्हें पता है मेरी कुमुद मुझे डर लगता है माँल के मध्यमवर्गीय अय्याशी से।
तुम सही कहती हो कुमुद,मैं बहुत ओल्ड थिंकिंग वाला हूँ।

Thursday, 10 March 2016

बिहार बोर्ड की परीक्षा को तुम फैंतेसी का नाम मत दो।

कल से बिहार बोर्ड की दसवीं कक्षा की परीक्षा शुरू होने वाली.है।खैर,मैं स्वयं दसवीं बिहार बोर्ड से नही दिया हूँ,पर बिहार बोर्ड को बहुत करीब से महसूस किया हूँ।
कल लोग नही बोलेंगे कुछ,कल हमेशा चुप रहने वाली तमाम सड़कें और गाँव की पगडंडियाँ गवाही देंगी की आज से बिहार बोर्ड के दसवीं की परीक्षा का आगाज हो गया है।
बता दूँ की यह सिर्फ परीक्षा मात्र नही होती है,यह एक पर्व सरीखा होता है,आज तक जो लड़कियाँ घर से नही निकली होंगी,जिनका जीवन अपने गाँव के चौहद्दी तक सिमित रहा होगा,वो कल सुबह होते ही तमाम आशंकाओं और बाधाओं को तोड़ते हुए कोई अनजान से कस्बे और शहर का रूख करेंगी।
बिहार बोर्ड के बारे मे बहुत सारी बतकही है,बिहार बोर्ड परीक्षा को तो क ई भद्रजन बस चोरी और छिनत ई से ही समझने की कोशीश कर लेते हैं।बिहार बोर्ड को चोरी का अड्डा कहकर फैंतेसाईज भी कर लेते होंगे कुछ महाराज टाईप के लोग।
खैर,ये बात भी है की बिहार बोर्ड में बहुत जगह चोरी-छिनत ई होता है।आप ड्यूटी पर तैनात सिपाही जी को खैनी-पान भर पैसा दे दिजिए और वो आपके वार्ड के पास तमाम पोथी-पूर्जा रसीद कर देंगे।मास्टर साहेब लोग भी बहुत सेटिंग करते हैं,हर तरह से।बिहार बोर्ड परीक्षा की क ई कहानियाँ आज किंवदंति बन ग ई हैं।पुराने टाईम मे लोग अपने लंगोट तक में पूर्जा खोंस के ले जाते थे,फिर एटम बम का जमाना आया।एटम बम को बेंच के भितरी स्पेस में सेट कर दीजिए और फिर उसमें पूर्जा रखकर चेंप दीजिए।
ये सब जुगाड़ साधारण लोग से लेकर नेता मंत्री के वार्ड के लिए भी होता है।
और दिगर बात ये है की जहाँ प्रशासन ने लगाम दबाया की छात्र के साथ आये उनके परिजन लोग क्रांतिकारी  हो गये,भ ईया जे.एन.यू वाले लोग भी ऐसी क्रांति कहाँ करते होंगे।
कड़ाई जहाँ हुआ की एक कैंडिडेट के साथ जो तीन लोग अतिरिक्त आते हैं,वो कटने-मरने के लिए भी तैयार।यै लै जिंदाबाद-मुर्दाबाद का नारा चालू।इसलिए प्रशासन भी बहुत कम बार ही ऐसी करने का ज़हमत उठाता है,खासकर दूर-दराज के क्षेत्रों में तो एकदम नही।
ये पहला पक्ष है,दूसरा पक्ष मज़ेदार कम पर सुंदर अधिक है।बिहार बोर्ड का परीक्षा अपने भीतर संघर्ष की क ई कहानियों को बयां करता है।क ई नगीने निकलते हैं बिहार बोर्ड से,जिनकी अनूठी कहानियाँ होती है सफलता की।
एक बार मैंने पढ़ा था कही की कैसे एक लड़का गाँव की पगडंडी पर चलती भैंसों के पीठ पर बैठकर तैयारी करता था,क्योंकि गरीबी होने के चलते परिवार वाले नही चाहते थे की उनका नन्हका आगे पढ़,पर किस्मत को तो कुछ और ही मंजूर था।आज वह लड़का आ.आई.टी,बनारस में पढ़ रहा है।बिहार बोर्ड के चलते ही क ई अनजान जगह हमेशा के लिए लोगों के मानस पटल पर आ जाता है।
इसलिए कोई भी बिहार बोर्ड की परीक्षा को चिट्ठा और फर्रा नाम की सज्ञाओं से ही मत फैंतेसाईज करो।

Tuesday, 1 March 2016

नास्तिकता और मै।

आप नास्तिक हैं क्या? कुछ दिनों से कुछ ऐसे ही सवालो से गुजरना पड़ रहा है।जबतक आप बहुमत मे होते हैं,तो आपसे कोई भी सवाल नही करता,आप सभी की नजरों मे सही होते हैं।पर आपने जैसे ही कोई अपना वैकल्पिक
रास्ता अख्तियार कर लिया,आप पर तोप से प्रहार किया जायेगा,ऐसे प्रश्न पूछे जायेंगे जिनका औचित्य ही नही है,जिसका उत्तर पूछने वाले के पास भी नही है।

शायद ही मैने कभी किसी को किसी से पूछते हुए देखा हो-कि क्या आप ना

 आस्तिक है क्यो नही है पर नास्तिकता पर सवाल उठायेंगे बिना कोई तर्क के।


धर्म एक ऐसा चीज़ है जिसपर चर्चा करने वाला व्यक्ति चाहता है की सभी लोग उसके कहे अनुसार बात करे,कोई भी किसी तरह का सवाल न खड़ा करे।अगर आप सवाल करते हैं तो आप पर ही तंज़ किये जायेंगे,आप के तर्कों को काटने के  लिए तमाम तरह के कुतर्कों को जन्म दिया जायेगा।
मैं किसी भी धर्म को इसलिए भी नही मानता क्योंकि धर्म हमे अपनी तरह से सोचने नही देता,तमाम जगहो पर अवरोधक तत्व का काम करता है।
धर्म को एक हथकंडे के रूप मे जिस तरह से इस्तेमाल  किया जाता रहा है,वह चीज मुझे व्यथित करता था।
धर्म मे एक भगवान होता है,जिसे सर्वोपरि मान लिया जाता है,उसके अत्याचारो का भी महिमामंडन किया जाता है,उसके द्वारा दिये गये तमाम दुख और दर्द को भाग्य जैसा मानवनिर्मित शब्दो से जोड़कर उसे क्षमा कर दिया जाता है।
मै अपने आप से रोज सवाल करना चाहता हूँ,हर तरह के सवाल करना चाहता हूँ,जो की शायद ही कोई धर्म करने को ईजाज़त दे।मै हर चीज से सवाल करना चाहता हूँ,जानना चाहता हूँ,सीखना चाहता हूँ।
भगवान को लोग अजर,अमर,सर्वव्यापक,सर्वशक्तिमान मानते है,अगर कोई इतना कुछ है तो उसे किसी चीज़ से नही डरना चाहिए,हर तरह के सवालो से गुज़रना चाहिए,जबाव भी देना चाहिए।
पर,सवाल करने से भगवान को ठेस पहुँचता है,वे आहत होते हैं,इतने गुण होने के बाद भी आखिर कोई नियमो का दास कैसे हो सकता है?अगर वो दास है तो मै उसे नही मानता।
किसी को अगर आप भगवान मे विश्वास दिलाकर उसका सबकुछ लूट भी लेते हो तो,आप पर कोई सवाल नही कर सकता,यही भगवान है।पर मै सवाल करना चाहता हूँ।
रोम जल रहा था और निरो अपना मनोरंजन कर रहा था,जश्न मना रहा था,भगवान भी तो लोगो को मारता है,शायद निरो से भी निर्मम तरीके से,भगवान भी तो मनोरंजन करता मौतों को देखकर।इसलिए मै भगवान के अस्तित्व को व्यक्तिगत रूप से खारिज करता हूँ।
तमाम लोगो पर जो अत्याचार किया जाता है,उसमे भी भगवान का ही नाम होता है,चाहे वह अत्याचार ब्रहमणों और मठाधिसों द्वारा दलितो पर किया जाये या सामंतो द्वारा गरिबो का शोषण किया जाये।

Monday, 22 February 2016

चूना खैनी वाला भूत का परिवार

बिहार के सोनपुर में छत्तर का मेला लगता जिसे बहुत लोग एशिया का सबसे बड़ा पशु मेला मानते हैं।हर भेरायटी  की गाय,भैंस,हाथी,घोड़ा,कुत्ता।लोगों का मानना है की सबसे निपुण अरबी घोड़ा छत्तर के मेला मे ही आता है।
कोसों दूर से चलकर लोग मेला माकने और देखने आते हैं।मगध,भोजपुर,तिरहुत,मिथिला,यहाँ तक की नेपाल से भी लोग छत्तर आते हैं।
छत्तर मेला पर इतना विश्वास की बहुत लोग तीन-चार महीना बिना गोरस-पाती के गुजार देते हैं,लोगों का आज भी मानना है की छत्तर की गाय का दूध तीन महीना और दूसरे मेला की गाय का दूध आठ महीना खाने के बराबर है।अगर घोड़ा दौड़ कही हो रहा है तो अगर किसी घुड़सवार को पता चल गया की फलाने आदमी का घोड़ा छत्तर से आया है और उसका घोड़ा ऐसे ही कालीचरन छाप मेला का है ,तो वह आदमी आधी बाजी पहले ही हार जाता है।
तो चलिए मैं आपको ले चलता हूँ बहुत साल पहले।
सोनापुर गाँव में बली सिंह नाम के एक आदमी रहते थे,शरीर से एकदम बलिष्ठ,मध्यम कद,सर के आधे बाल सफेद हो गये थे।लोगों का मानना था की बली सिंह ग्यारह साल की उम्र से ही गांजा पी रहे हैं और धत्तूर के बीच का सेवन कर रहे हैं।बली सिंह की पत्नी भी बहुत पहले ही स्वर्ग चली ग ईं।कोई बाल-बच्चा नही।गांजे को ही अपना जीवन मान लिये थे बली सिंह।आँखें हमेशा लाल रहती थी।गांजे का दम लगाने के पहले वह बोला करते थे-
बम भोले कैलाशपति,भाँड़ मे जाये लाखपति,
चिल्लम चढ़े धकाधक,धुँआ उठे फकाफक।गाँव के लोग भी उनको कोई काम का नही मानते थे।सबलोग बली सिंह को फालतू ही समझते थे।पर उनकी एक जगह पूछ सभी लोग करते थे,जिन्हे भी दुधारू पशु लेना है,वे बिना बली सिंह से पूछे नही लेते थे।लोगों का मानना है की एक कोश दूर से ही किसी जानवर को देखकर बली सिंह,उसके गुणों और अवगुणों को बता देते थे।
मने,बली सिंह जानवर पसंद करने के मामले मे एकदम टेका आदमी।छत्तर मेला के समय मे बली सिंह,बली बाबू हो जाते थे।
एक बार बली सिंह अपने ही गाँव के धनाठ आदमी धनेश्वर बाबू के साथ,धनेश्वर बाबू के लिए जर्सी गाय पसंद करने छत्तर गये।पूरा मेला का चार चक्कर माकने बाद गाय मिल ग ई।मेला मालिक के मुंशी से करारनामा बनवाया गया।फिर बली बाबू ने नेपाल से आये नागा साधुओं के साथ गुड़ की जलेबी के साथ नेपाली गांजे का कश लगाया।
बेर गिरने पर था,मेला से लोग चल दिए।गाय का पगहा धरे धनेश्वर सिंह का आदमी आगे बढ़ रहा था।पीछे-पीछे बली बाबू और धनेश्वर बाबू थे।करीब पाँच कोस जमीन चलने के बाद एक नदी पार करना पड़ता है,अंधेरा भी हो गया था।रास्ते मे क ई आदमी ने टोका भी था की अंधेरा होने पर नदी मत पार करियेगा।लोगों का मानना है की नदी के पास जो पीपल का पेड़ है,उसपर एक प्रेत के परिवार का वास है।
किसी पार करने वाले को नही छोड़ता है।पानी मे डूबा-डूबाकर अधमरा कर देता है और फिर साँप के कोड़े से मार-मारकर सीधे परलोक भेज देता है।लोगों का मानना है की हर मरने वाला भुतों के परिवार का सदस्य बन जाता है।
पर बली सिंह तो ठहरे अपने ही किस्म के आदमी।धोती को चार बित्ता ऊपर उठाये और चभ्भ से पानी मे हेल गये।पानी मे चार डेग ही आगे बढ़े की पीपल के पेड़ से चभाक चभाक किसी के कूदने का आवाज आया।
बली सिंह एकदम आवाक रह गये,गांजे का नशा एकदम से क्षण भर मे ही टूट गया।
बली बाबू चारो तरफ से घीरे हुए थे।भुतों के पैर उल्टे थे और हाथ खजूर के पेड़ की तरह।कोई भूत बली सिंह से गांजा माँगता,तो कोई रामपुरिया खैनी।
अंतिम मे जाकर बात खैनी पर सलटा और बालदेव सिंह की जान बची।
तब से आजतक जो भी अंधेरे में नदी पार करता है,उससे पहले वह एक किल्ली खैनी पीपल के पेड़ के नीचे रख देता है।
इस तरह फालतू समझे जाने वाले बली सिंह की भी कहानी अमर हो ग ई।

Friday, 25 December 2015

मैं छद्म तो तुम क्या?

पीछले कुछ समय में आस-पास बहुत कुछ बदला है।नये लोगों से मिलना हुआ है,उनसे लंबी-लबी बातें हुई है।कभी ऐसा लगता है की पीछले कुछ समय में बहुत लोगों के सोच में एक भयानक परिवर्तन आया है।परिवर्तन राजनितिक रूप से आया है,सांप्रदायिक रूप से आया है।अक्सर लोग संप्रदाय विशेष को राजनीति से जोड़कर बात का बतंगड़ बना देते हैं।
कुछ दिन पहले असहिष्णुता का मुद्दा छाया हुआ था।लोग बताने में लगे थे कि कौन कितना सहिष्णु और कितना असहिष्णु है।इस मुद्दे को भी सांप्रदायिक रंग दिया गया था।
लोग इस तरह के प्रश्न पूछ रहे थे-
~क्या एक मुसलमान के मरने से असहिष्णुता आ गया देश में।
~क्या देश में ऐसा माहौल पहले कभी नहीं आया,तब ये लेखक लोग कहाँ थे?
~1984 सिख दंगा के समय ये लोग कहाँ थे?
~जब कश्मिरी पंडित पर अत्याचार हो रहा था,तब ये लोग कहाँ थे।
गौर करने पर पता चलता है की ऐसे सवाल करने वाले लोगों का एक विशेष वर्ग से अलगाव रहा है और एक विशेष वर्ग से विशेष लगाव भी रहा है।

मेरा कुछ प्रश्न है-
~भारतीय स्वतंत्रता संग्राम कि पहली लड़ाई 1857 में ही क्यों हुई,उसके पहले भी भारत के लोग त्रस्त थे?
~अंग्रेज भारत छोड़कर 1947 में ही क्यों गये?
ये सवाल थोड़े बेतुके लग सकते हैं,पर जबाव तलाशना हीं होगा।

मैं एक व्यक्तिगत बात बताना चाहता हूँ।मेरा एक दोस्त है,राजस्थान का,मुसलमान है।बेहद सरीफ बंदा,खाने में शुद्ध शाकाहारी,कोई चीज से परहेज भी नहीं करता।एक दिन बातों-बातों में हीं मैंने एक सवाल दाग दिया-
क्या तुम्हें लगता है की पीछले कुछ समय में एक संप्रदाय विशेष के खिलाफ में कुछ माहौल पनपा है?
थोड़ी देर सोचकर वह बोलता है-यार,तुम इस बात को जानते हो,फिर भी ऐसे सवाल दागते हो।
वह आगे बोलता है-हाँ,यार लोग अब एक-दूसरे को ज्यादा संदेह से देखने लगे हैं।हमें हर बार,हर जगह,हर बात का प्रमाण देना पड़ता है।हमें तो देशभक्ति का आँबजेक्सन सर्टिफिकेट दे दिया गया है।
आगे वह कुछ नहीं बोलता है।
आगे मैं भी कुछ नहीं पूछता।

यह सही है कि हमारे आस-पड़ोस में आज भी कट्टर लोग कम हीं है,पर हमारी चुप्पी ही उन लोगों को बढावा देती है और हमें ऐसा लगने लगता है कि वे बहुसंख्यक हो चले हैं।हमें बोलना होगा.ऐसे तत्वों के खिलाफ में,हमें लड़ना होगा छद्म धार्मिक कट्टरपंथों से,हमें उनके बात का जबाव देना होगा ।
हमें जानना और समझना होगा की-
~ हमारे ईश्वरों और पैगंबरों को अपनी रक्षा के लिए लठैतों की जरूरत नहीं है।

Friday, 11 December 2015

क्लासरूम की कुछ यादें।

कभी कभी मन एन.आई.टी,रायपुर की क्लासेज से निकलकर डी.ए.वी आरा के क्लासेज की ओर चला जाता है,कितना कुछ सीखा था मैंने वहाँ।
खासकर पापा के हिस्ट्री और पौलिटीकल साइंस की क्लासेज में।पापा से क्लास में बैठकर पढना एक अलग खुशनूमा अनुभव रहा है मेरा।हमदोनों को एक-दूसरे के प्रति कितना संयम बनाये रखना होता था,वो बोलते थे,मैं सुनता और सीखता था।
वो क्लास में सिर्फ पढा नहीं रहे होते थे,बल्कि खुद भी पढ रहे होते थे।वो आज भी कहते हैं की-जिस भी दिन,जिस भी कारनवश मैं अपने छात्रों को पढना बंद कर दूँगा,मैं एक शिक्षक नहीं,बस एक सिलेबस कंटेंट सप्लायर बनकर सिमट जाऊँगा।
एक शिक्षक को भी निरंतर धैर्य के साथ पढना पड़ता है,अपने छात्रों को पढना होता है।जिस दिन यह काम बंद,आप एक शिक्षक से सिमटकर एक सिकंस बन जाऐंगे।
परखना होता है,कमजोर बच्चों के गुणों को,उनके भावनाओं को,शिक्षक वही जो साधारण को भी असाधारण बना दे।पापा कहते हैं की टाँपर बच्चों को कोई भी शिक्षक नहीं पढा सकता,उनका तो बस मार्गदर्शन करना होता है,पढाया तो जाता है साधारण या मध्यमवर्गीय छात्रों को हीं।
इतिहास बोध का  ज्ञान आपके क्लास में हीं प्राप्त हुआ,मैंने तो बस पढा,उसका बोध तो आपने हीं करवाया।इतिहास जैसे बोरिंग हो जाने वाले सब्जेक्ट को भी आपने मनोरंजक बना दिया।आपका कहना है की बगैर अपने इतिहास को पढे और जाने हम विकसित हो ही नहीं सकते,हाथ में आ.ई. फोन रखने से,बड़े अपार्टमेंट में रहने से,मर्सिडिज में घूमने से हम विकसित नहीं हो जाते हैं।विकसित होने के लिए हमें विषयबोध के बोध से गुजरना होता है,मानव के इतिहास को जानना होता है,उससे सीखना होता है।
आपकी फ्रेंच क्राँति पर लंबे-लंबे लेक्चर,ज्याँ जैक्स रूसो,वोल्टायर,जौन लौकी,मौंनटेंस्क्यू के योगदानों को समझाना आज भी याद है।इनके विचारों के प्रासंगिकता को आज के समय.में परिलिक्षीत करना।फिर रूसी क्रांति का लाल दौर,स्टालीन और भी क ई।
समकालीन भारतीय इतिहास को तो आपने इतनी अच्छी तरह बताया की मैं आपसे दावा कर सकता हूँ की-इस विषय पर आपसे भी अधिक लेक्चर दे सकता हूँ।इतिहास को आपने रोजाना की चीजों से कनेक्ट कर दिया।
पौलिटीकल साइंस में भारतीय संविधान,राजनितिक पार्टियाँ और उनके स्वभाव,आंदोलनों के महत्व आदि को आप के क्लास में हीं बैठकर समझ पाया।
अगर वक्त फिर से ज़रा मोहलत दे  तो आपके क्लास में लौटना पसंद करूँगा,पर वक्त की भी कुछ अजीब हीं माँग है।न लौटता है,न लौटने देता है।
आज भी आप कहते हैं की बिपन चंद्रा,इरफान हबीब,गुहा,रोमिला थापर की पुस्तकें जरूर पढना,अगर समय मिले तो।आप हमेशा मेरे अंदर क्लासरूम बनकर मौजूद रहते हैं।

Tuesday, 3 November 2015

सौतेली संताने-छोटे किसान।

कभी-कभी हरियाली भी बस दिखावे भर के लिए होती है।जब हरियाली हीं संकट और हताशा का प्रतिक बन जाये,हरियाली होने पर भी जब लोग मातम मनायें,तो सोचिए वह कितना कल्पनातीत होगा।
हरियाली तो है,पर पता है की ये हरियाली 15 दिन बाद चली जायेगी और एक ऐसी स्थिति दे जायेगी जिससे बाहर आना अत्यंत मुश्किल हो जायेगा।
जेठ खत्म होते हीं किसान आकाश की ओर टकटकी लगाकर देखने लगते हैं,तरह-तरह की आशंकायें व्यक्त की जाती है,वर्षा में देरी होने पर गाँव के बुजुर्गों पर चुपके से कीचङ फेंके जाते हैं,मेढक की शादि कराई जाती है।
फिर एक दिन, रात भर जमकर वर्षा होती है।
अगली सुबह छोटे किसान या कहें की दिल्ली,बंब ई,सूरत से कुछ पैसे कमाकर लौटे भूमिहीन गाँव के बङे किसान के दलान-द्वार पर हाजिर।
हाजिर,खेत लेने के लिए साल भर के लिए।पट्टा पर,अध ईया पर,मनी पर।आज भी कोई मजदूर कहलाना नहीं चाहता,दिल्ली-सूरत जाकर मजदूर बनने से अच्छा की बीघे,दो बीघे की खेती हीं कर ली जाए।
फिर शुरू होता है संघर्ष,भादव भी आ गया,पर बारिश नहीं हुई।काले बादल तो रोज हीं दिखते हैं आकाश में पर बरशते हीं नहीं।ये काले बादल हीं तो छोटे किसानों,मजदूर लोगों के जीवन के काल का प्रतिक होते हैं।
सरकार की तरफ से सिंचाई की कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं,अफसर के पास जाओ तो ,वे अपनी जेब गर्म करने के फेर में।कोई वैकल्पिक सहायता नहीं।
खेत में धान के पौधे तो हैं,पर यें आने वाले पंद्रह दिनों में पीले पङ जायेंगे और फिर किसान भी पीले पङ जायेंगे।
जहाँ कोई आशा नहीं है,बस सोचना है की जीना है या मरना है या मर कर जीना है।
ये है हमारे महान राष्ट्र के सौतेले संतान,छोटे,मध्यमवर्गीय किसानों की कहानी।