Sunday, 16 August 2015

ईंतजार।

क्या पता कभी-कभी मन कहाँ चला जाता है।

मुझसे शायद बहुत दुर।
कहाँ?
ये मुझे भीं नहीं पता।
मन न जाने किसका ईंतजार करने लगता है।
शायद किसी ऐसे का जिसका ईंतजार जो कभी खत्म ना हो।उसका जो शायद कभी भी ना मिल सके।
उसका जो शायद बहुत दुर है।
उनका ईंतजार करना जो कभी ना आएंगे,कितना कष्ट देता है।ऐसे लोगों का ईंतजार करना शायद अपने आप से बेईमानी है,पर मन फिर भी ऐसे लोगों का हीं क्यूँ ईंतजार करता है।
कुछ लोग जो बहुत दुर हैं,कभी देखे न ग ए हों सालों से पर फिर भी मन ऐसे लोगों का व्याकुलता से क्यूँ ईंतजार करने लगता है?
कुछ लोग बहुत कम समय में हीं समय के सीमा को पारकर आपके बहुत करीब आ जाते हैं, बहुत दुर होते हुए भी और शायद फिर शुरू होता है कभी न खत्म होने वाला ईंतजार।
हम ईंतजार क्यूँ करते है?
ये सवाल मैं अपने आप से क्यूँ पूछ रहा हूँ।
मैं भी तो कभी कभी ये ईंतजार का हीं सहारा लेता हूँ।
ईंतजार में मन किसी एक को हीं व्याकूल होकर क्यूँ याद करने लग जाता है?
ईस लाईलाज बिमारी का कुछ तो नाम होगा ना?

Saturday, 15 August 2015

राखी और दिदी।

माँ तो बस एक हीं होती है,पर मेरी एक और माँ है। बिल्कुल माँ कि तरह हीं प्यार करती हैं,माँ से अधिक ख्याल रखती हैं।मेरा बचपन उनके साथ हीं कटा
मैं अपनी दिदी कि बात कर रहा हूँ।कुछ दिन पहले उनका फोन आया था, पूछ रहीं थी कि रायपुर राखि भेज देते हैं।मैं कुछ भी बोलने की दशा में नहीं था।शायद वो मेरी चुप्पी को परख लीं।
दिदी के बिना यह मेरी दुसरी राखी होगी।शायद आनेवाले समय में यह अंतराल और बढेगा हीं
राखि के कारन हीं पहलेसकि क ईं बातें मन में कौंधने लगीं है।आप कितनी तैयारियाँ करतीं थीं राखि को लेकर।दिल में जो बातें कहीं खो सी ग ईं थीं आज फिर से याद आ रहीं हैं।
ये भाई-बहन का प्रेम हीं तो है जिसके कारन ईतनी दुर बैठा आपको याद कर रहा हूँ।
आप मुझसे ११ साल बङी होने के बाद भी जो लङाईयाँ करती थीं आज मन को एकाएक खुशी दे रहीं हैं।हमलोगों कि लङाईयाँ रिश्तेदारों के यहाँ भी मशहूर हैं।
आपको याद होगा कि कैसे पापा भी हमारे बिच में  होने वाली लङाईयों से अजीज आ जाते थे।आपके कारन हीं पापा मुझे क ई बार अपना बङा वाला ऊपहार दे देते थे।
सबसे अधिक परेशान तो माँ होती थीं।हमें एक-दुसरे से न बोलने का सौगंध तक दे देती थीं।
उसके बाद जब आप रोती थीं तो मुझे बङा आनंद मिलता था।भ ईया हमारी बातों को कैसे चुपचाप देखता था।
आपको याद करके पटना वाला डेरा याद आ गया।कैसे बिजली चले जाने पर आप रात भर जगकर पंखा झालती थीं।आपको जो कुछ भी मिलता था उसमें एक हिस्सा मेरा भी होता था और आप कहती थीं-बाबु के लिए रख दे रहें हैं,आएगा तो खा लेगा।
मेरा बचपन तो आपके साथ हीं बीता।माँ तो कभी-कभी हीं पटना आती थीं।
आपने माँ के दुर होने का एहसास कभी नहीं होने दिया।
लोग कहते भी थे-कितना प्रेम से तिनों भाई बहन रहते हैं।
घर में लोग मुझे मयफट समझते हैं।
पर आपकी बिदाई के दिन सबसे अधिक मैं हीं रोया था,ईतना अधिक कि आप चुप होकर मुझे चुप कराने लग ग ईं थीं।
आपके बिदाई के कुछ दिनों बाद तक ऐसा लगता था कि किसी ने हमसे मेरे सबसे अनमोल चिज को छीन लिया।
आज भी पटना या आरा जाता हूँ तो माँ के बाद सबसे पहले आपको हीं देखने जाना चाहता हूँ।
अब तो छुटकी भी मिलने का बहाना हो ग ई है।
आपने मुझे जितना प्यार दिया है ऊतना शायद हीं मैं आपको दे सकूँ पर कोशीश जरूर करूँगा।
हमारे बीच में राखी का प्यार ईसी तरह बना रहे।

Tuesday, 11 August 2015

एक दिन बस्तर में।

बस्तर में एक अजीब सी शांति देखने को मिलती है।
मुझे बस्तर जाकर एक अजीब सा आराम मिला
मुख्यभारत के शहरों से बिल्कुल अलग है बस्तर।
अपने आप में एक सुनापन लिए।

किसी को भी नहीं पता रहता कि ये अजीब सी शांति ना जाने कब गोलियों कि तङतङाहट में बदल जाए।
एक दिन में हीं काफी कुछ देखने और सीखने को मिला।

Wednesday, 5 August 2015

अनचाहा डर

तुम गरीब हो
तुम कमजोर हो
तुम अनपढ हो
तुम दुनिया से अनजान हो
तुम बेबस हो
तुम लाचार।

तुमहारे तने होने के बावजुद तुमसे डरता हूँ।
तुमहारी परछाई के बारे में भी रात को सोचता हूँ तो मन सीहर जाता है।
हमने तुम्हें ताउम्र सताया है।
हमने तुम्हें कुछ भी करने से रोका है।
हमने तुम्हारी ईज्जत गिरवी रख दी।
तुम्हें अपने पैरो तले दबाया है।
हमने हीं तुम्हें नीचे गिराया है।

हाँ, हमें तुमसे डर लगता है,ऐसा डर जो हमें अंदर हीं अंदर सताता है।
ये डर हीं हमें मजबूर बनाता है।
हाँ मैं तुमसे डरता हूँ।

तुमने हमें एक काल्पनिक डर दे रखा है।
उस कल्पना के आगे हम सोच भी नहीं सकते।
कल्पना में हीं हमारे अस्तितव पर एक खतरा मंडराने लगता है।
हाँ मैं तुमसे डरता हूँ क्यूँ कि तुम एक दलित हो।

Sunday, 2 August 2015

अरमां असंख्य

कितने सपने हैं,कितने अरमां हैं
शायद असंख्य,अनगीनत।
काश कोई अरमानों में पंख लगा देता
शायद कोई तरकी़ब सीखा देता।
शायद सारे अरमां यथार्थ में तब्दील हो जात
शायद सारे अरमां जीवन को एक नया ऊजाला दे देता।
मेरे अरमां असंख्य,अनगीनत हैं
शायद कोई तो अरमानों में पंख लगा देता।

Monday, 27 July 2015

आप मेरे भीतर ईतना क्यों बसी हैं?

शायद मैं बस मैं नहीं हूँ,आप मेरे भीतर हर जगह हैं।
कुछ भी करता हूँ या करना चाहता हूँ तो सबसे पहले आपकि स्म्रिति आति है।
आपके बारे में हीं सोचने लगता हूँ।
आपके ढेर सारे डायलाॉग दिमाग में कौंधने लगते हैं।
आपकी कही बातें याद आनें लगती हैं।
आप मेरे अंदर ईतनी गहराई से क्युँ बसी हुई हैं?
मेरे हर व्यक्तिगत फैसलों के भीतर भी आप हीं क्युँ होती हैं?
मेरे हर बातों में आप हीं क्युः होती हैं?
आप अगर मेरे अंदर ईतना गहरा न रहती तो मैं भी औरों की तरह हीं रह जाता।
आप एक कठोर पित्रिस्त्तामक समाज से निकलने के बावजूद भी ईतनी आजाद कैसे हैं?
आप अपने अधिकारों को लूकर ईतनी सश्क्त कैसे हैं?
आप तो बेटा और बेटी के बीच के अंतर हीं नहीं जानती जो की आपके समय में सबसे पहले बताया जाता होगा।
आप तो दोनों को समान समझती हैं।
आपने अपने विचार को हमारे ऊपर कभी थोपने कि कोशीश हीं नहीं की।
मैं आपके भगवान का आपके सामने मजाक करता फिर भी आप कुछ न बोलती,आपका उस पत्थर में विश्वास बना रहता है।
पर मैं जानता हूँ कि उस पत्थर के सामने आप हमारे लिए हीं खङी होती हैं।
आप जो भी करती हैं वो हमारे लिए हीं करती हैं।

ईसलिए आप मेरे भीतर ईतनी गहराई से बसी हैं।
कभी सोचता हूँ कि मेरे भीतर आप अगर न होतीं तो मैं कैसा होता,पर ईसके आगे सोचते कि शक्ति हीं खत्म हो जाति है।

Saturday, 25 July 2015

अस्मिता को मत छेङिए मोदी जी।

सबसे पहले तो मैं माननीय प्रधानमंत्री मोदी जी का आभार प्रकट करना चाहता हूँ कि सभी लोगों की तरह आपको भी बिहार की याद आ हीं गयी भले वह चुनावी समर के हीं बहाने क्यों न आई हो।
ईसके लिए भी आपका आभारी हूँ की आपको अभी भी याद है की बिहार एक पीछङा राज्य है और इसे विकास कि सख्त जरूरत है।
हमारे पीछङेपन का याद दिलाने के लिए धन्यवाद।
हमें तो बस आपसे हीं विकास की आशा है।
ईसी तरह १४ महीने पर बिहार आते रहिये और विकास के लिए स्पेशल पैकेज का ऐलान करते रहिये।
माननीय मोदी जी आपको एक बात जानकर बहुत खुशी होगी,आफको पता है कि नहीं:-आपके भाषण से हीं हमारे बिहार का विकास हो जाता है।
आपके भाषण से हीं विकास की धारा निकलती है ना।
आपसे निवेदन है की अपने भाषण में थोङा और बल लगाकर ऊसको फेंकियेगा।
आप तो शायद न्युटन के तीसरे बल के नीयम को जानते हीं होंगे।
पर आपके विज्ञान के ज्ञान पर थोङा शक जरूर होता है जो कि लाजमी भी है।
आप तो ६० दीन में हीं विकास कर देते हैं पर हमारे बिहार में तो ६०साल में भी नहीं हो पाया।
खैर अब चिंता करने की बात नहीं है,अब आप जरूर विकास कर दोगे,आपके पास बात का जो जंजाल है।
पता नहीं आपके वैदिक वैज्ञानिकों ने कौन सा ऐसा यंत्र बना डाला जो ६० दीन में हीं विकास कर देता है।
ईसके लिए आपको उन महान संघी वैदिक वैज्ञानिकों के लिए नोबल पुरस्कार की समीक्षा करनी चाहिय।
नोबल पुरस्कार के बारे में तो आपको पता हीं होगा,पर फिर भी शक होता है मोदी जी जो की लाजमी है।
है कि नहीं?
खैर आपको तो बिहार कि जनता पर पूरा विश्वास हैं हीं,वो तो मुझे भी है।
आपको बिहार में बस २लोंगों पर नहीं है।
पर एक बात गौर करने लायक है।
बिहार के लोगों का तो डी.एन.ए हीं खराब है,और हाँ खराब डी.एन.ए का बहुत कम समय में हीं रीप्लिकेशन होता है जो कि शायद आप जानते हिं हैं।
सो जरा शतर्क रहने की जरुरत है।
है कि नहीं।