Tuesday, 11 August 2015

एक दिन बस्तर में।

बस्तर में एक अजीब सी शांति देखने को मिलती है।
मुझे बस्तर जाकर एक अजीब सा आराम मिला
मुख्यभारत के शहरों से बिल्कुल अलग है बस्तर।
अपने आप में एक सुनापन लिए।

किसी को भी नहीं पता रहता कि ये अजीब सी शांति ना जाने कब गोलियों कि तङतङाहट में बदल जाए।
एक दिन में हीं काफी कुछ देखने और सीखने को मिला।

Wednesday, 5 August 2015

अनचाहा डर

तुम गरीब हो
तुम कमजोर हो
तुम अनपढ हो
तुम दुनिया से अनजान हो
तुम बेबस हो
तुम लाचार।

तुमहारे तने होने के बावजुद तुमसे डरता हूँ।
तुमहारी परछाई के बारे में भी रात को सोचता हूँ तो मन सीहर जाता है।
हमने तुम्हें ताउम्र सताया है।
हमने तुम्हें कुछ भी करने से रोका है।
हमने तुम्हारी ईज्जत गिरवी रख दी।
तुम्हें अपने पैरो तले दबाया है।
हमने हीं तुम्हें नीचे गिराया है।

हाँ, हमें तुमसे डर लगता है,ऐसा डर जो हमें अंदर हीं अंदर सताता है।
ये डर हीं हमें मजबूर बनाता है।
हाँ मैं तुमसे डरता हूँ।

तुमने हमें एक काल्पनिक डर दे रखा है।
उस कल्पना के आगे हम सोच भी नहीं सकते।
कल्पना में हीं हमारे अस्तितव पर एक खतरा मंडराने लगता है।
हाँ मैं तुमसे डरता हूँ क्यूँ कि तुम एक दलित हो।

Sunday, 2 August 2015

अरमां असंख्य

कितने सपने हैं,कितने अरमां हैं
शायद असंख्य,अनगीनत।
काश कोई अरमानों में पंख लगा देता
शायद कोई तरकी़ब सीखा देता।
शायद सारे अरमां यथार्थ में तब्दील हो जात
शायद सारे अरमां जीवन को एक नया ऊजाला दे देता।
मेरे अरमां असंख्य,अनगीनत हैं
शायद कोई तो अरमानों में पंख लगा देता।

Monday, 27 July 2015

आप मेरे भीतर ईतना क्यों बसी हैं?

शायद मैं बस मैं नहीं हूँ,आप मेरे भीतर हर जगह हैं।
कुछ भी करता हूँ या करना चाहता हूँ तो सबसे पहले आपकि स्म्रिति आति है।
आपके बारे में हीं सोचने लगता हूँ।
आपके ढेर सारे डायलाॉग दिमाग में कौंधने लगते हैं।
आपकी कही बातें याद आनें लगती हैं।
आप मेरे अंदर ईतनी गहराई से क्युँ बसी हुई हैं?
मेरे हर व्यक्तिगत फैसलों के भीतर भी आप हीं क्युँ होती हैं?
मेरे हर बातों में आप हीं क्युः होती हैं?
आप अगर मेरे अंदर ईतना गहरा न रहती तो मैं भी औरों की तरह हीं रह जाता।
आप एक कठोर पित्रिस्त्तामक समाज से निकलने के बावजूद भी ईतनी आजाद कैसे हैं?
आप अपने अधिकारों को लूकर ईतनी सश्क्त कैसे हैं?
आप तो बेटा और बेटी के बीच के अंतर हीं नहीं जानती जो की आपके समय में सबसे पहले बताया जाता होगा।
आप तो दोनों को समान समझती हैं।
आपने अपने विचार को हमारे ऊपर कभी थोपने कि कोशीश हीं नहीं की।
मैं आपके भगवान का आपके सामने मजाक करता फिर भी आप कुछ न बोलती,आपका उस पत्थर में विश्वास बना रहता है।
पर मैं जानता हूँ कि उस पत्थर के सामने आप हमारे लिए हीं खङी होती हैं।
आप जो भी करती हैं वो हमारे लिए हीं करती हैं।

ईसलिए आप मेरे भीतर ईतनी गहराई से बसी हैं।
कभी सोचता हूँ कि मेरे भीतर आप अगर न होतीं तो मैं कैसा होता,पर ईसके आगे सोचते कि शक्ति हीं खत्म हो जाति है।

Saturday, 25 July 2015

अस्मिता को मत छेङिए मोदी जी।

सबसे पहले तो मैं माननीय प्रधानमंत्री मोदी जी का आभार प्रकट करना चाहता हूँ कि सभी लोगों की तरह आपको भी बिहार की याद आ हीं गयी भले वह चुनावी समर के हीं बहाने क्यों न आई हो।
ईसके लिए भी आपका आभारी हूँ की आपको अभी भी याद है की बिहार एक पीछङा राज्य है और इसे विकास कि सख्त जरूरत है।
हमारे पीछङेपन का याद दिलाने के लिए धन्यवाद।
हमें तो बस आपसे हीं विकास की आशा है।
ईसी तरह १४ महीने पर बिहार आते रहिये और विकास के लिए स्पेशल पैकेज का ऐलान करते रहिये।
माननीय मोदी जी आपको एक बात जानकर बहुत खुशी होगी,आफको पता है कि नहीं:-आपके भाषण से हीं हमारे बिहार का विकास हो जाता है।
आपके भाषण से हीं विकास की धारा निकलती है ना।
आपसे निवेदन है की अपने भाषण में थोङा और बल लगाकर ऊसको फेंकियेगा।
आप तो शायद न्युटन के तीसरे बल के नीयम को जानते हीं होंगे।
पर आपके विज्ञान के ज्ञान पर थोङा शक जरूर होता है जो कि लाजमी भी है।
आप तो ६० दीन में हीं विकास कर देते हैं पर हमारे बिहार में तो ६०साल में भी नहीं हो पाया।
खैर अब चिंता करने की बात नहीं है,अब आप जरूर विकास कर दोगे,आपके पास बात का जो जंजाल है।
पता नहीं आपके वैदिक वैज्ञानिकों ने कौन सा ऐसा यंत्र बना डाला जो ६० दीन में हीं विकास कर देता है।
ईसके लिए आपको उन महान संघी वैदिक वैज्ञानिकों के लिए नोबल पुरस्कार की समीक्षा करनी चाहिय।
नोबल पुरस्कार के बारे में तो आपको पता हीं होगा,पर फिर भी शक होता है मोदी जी जो की लाजमी है।
है कि नहीं?
खैर आपको तो बिहार कि जनता पर पूरा विश्वास हैं हीं,वो तो मुझे भी है।
आपको बिहार में बस २लोंगों पर नहीं है।
पर एक बात गौर करने लायक है।
बिहार के लोगों का तो डी.एन.ए हीं खराब है,और हाँ खराब डी.एन.ए का बहुत कम समय में हीं रीप्लिकेशन होता है जो कि शायद आप जानते हिं हैं।
सो जरा शतर्क रहने की जरुरत है।
है कि नहीं।

Tuesday, 12 May 2015

ऐ शहर बनारस।

Jo sahar jo mujhe sabse jaada apni ore kheechta hai wo Banaras hai.
Banaras padha jaane wala,likha jaane wala,kaha jaane wala,suna jaane wala or sabse jaada jiya jaane wala sahar.
Aajkal toh log ek-doosre se bass kaam ke liye milte hain.
Par Banaras me log Milne ke liye milte hain.
Saamajik ekta ko banaye rakhne wala sahar.
Purabiya prem ke prateek wala sahar.
Logon ko moksha dene wala sahar.
Hamare Bismillah khan kaa sahar.
Mandir
-Masjid kaa sahar.
Banarasi paan wala sahar.
Shankar ke damroo wala sahar.
Banaras se Patna bhi dikhta hai.
Khaati dehaati Majanua wala sahar.
Apnaapan sikhane wala sahar.
Isko dharam ke aadhar par nahin baata jaa Santa.
Aisi koshish karne walon ko Banarasiye log khader denge,yahi aasha hai.
Main apne Prem ko Banaras ke Assi chat or Lanka chat par dekhna chahta hoon,Ganga me dubki lagate hue.
Kya kucch nahi likha jaa chuka hai iss sahar ke baare me.
Phir bhi kucch likh diya.

ऐ माँ जरा खिसीआओ ना।

माँ का मिजाज सबसे ज्यादा तब खिसीआता है जब ऊ हमको फेसबुक पर लगी देखती है।
कहती है की मन करता है की इसको पटक दें।
माँ के शब्दों में:ई लईका दिनभर मोबाईल में लटकल रह हे,अब तोरा पङहाई लिखाई करल हो गेल ऊ।
मोबाईल के पीछे ई बिलोला रह हे।
उनका ईतना कहना की मेरा मोबाईल का टावरे जैसे भाग गया।
आज भी अगर गुस्सा जाती हैं तो मिजाज कठुआ जाता है।उन्होने हीं मूझे संघर्ष करना सिखाया,पढना सिखाया।वे हमेशा कहती हैं,पढाई हीं ऐसा है जो कभी व्यर्थ नहीं जाता है।
कभी कभी मनमुटाव भी हो जाता है
अपने जीवन में पहली महिला देखा जिनहोने अपने बच्चों को जातपात और धरम करम की बातें  नहीं सिखाई,शायद उनहीं के कारण आज नास्तिक हूँ।
भूमिहार होते हुए भी जात पात के मसलों पर हमेशा अपना विचार रखने वाली महिला।