Wednesday, 1 February 2017

निबाह-2


मेरी  जिंदगी  में  हर  घटनाएं  अकारण   ही  घटी  और  जैसा  की  मैं  कह  चूका  हूँ  कि मैं  इन  घटनाओं  को  अपने  भीतर  से  गुजरने  दे  रहा  था। दीपा  का  हाँथ  मेरे  हाँथ  में  आ  जाना  भी  एक  ऐसी  घटना  है  जिसका  ज़िक्र  मैं  थोड़ी  देर  बाद  करूँगा। क्योंकि  समय  के  साथ-साथ  घटनाओं  पर  से  रहस्यों  का  परदा  गिरने  लगा  है  और  घटनाएं  एकाएक  अपने  असली  रूप  में  हमारे  सामने  ऐसी  तीव्रता  के  साथ  आ  जाती  है  कि  फिर  हमलोग  उनमें  रहस्य  खोजने  लग  जाते  है। उस तीव्रता  को  कम  करने  के  लिए  मैं  उसकी  चर्चा  जरूर  करूँगा।
समय  की  नीरवता  को  तोड़ने  के  लिए उन  घटनाओं  को  लेकर  मैं  स्वयं  भी  उत्कंठित  हूँ।

लेकिन  उसके  पहले  चंद्रमाधव  की  दादी  के  बारे  में  बताना  चाहता  हूँ। चंद्रमाधव  की  दादी  जमीनदारों  के  चाहरदिवारी  और  किलों  में  बंद  तमाम  औरतों  का  प्रतिनिधित्व  करती  है। किले  में  बंद  औरतें  स्वभाव  से  विद्रोहिणी  नहीं  होती हैं, पूरे  वातावरण  की  नीरवता  और  शितलता  को  अपने  भीतर  समेटे  होती  हैं  किले  में  बंद  औरतें।

पर  चंद्रमाधव  की  दादी  जन्म  से  ही  विद्रोहीणी  थी। दादी  का  नैहर (मायके)  के  एक  बड़े  जमीनदार  के  यहाँ  था।  जैसा  की  मैं  पहले  भी  कह  चुका  हूँ  कि- "दादी के मस्तिष्क  में  प्रलय  का  कोई  शिलालेख   मौजूद  है, जो  उन्हें  अपनी  जिंदगी  की  तमाम  कठिनाइयों  को  सरलता  के  साथ  व्यक्त  करने  की  ताकत  देता  है"।

दादी  कहती  हैं- जमीनदारी  तो  उपरे  से  देखै  में  बड़ा  ठाट-बाट  जैसन  लगता  है, लेकिन  भितर  से  एकदम  खोखड़( खोखला ) होता  है।
जमीनदारों  ने  अपने  रैयतों  के  साथ  जो  अन्याय  किया  है उसका  फल  आज उन्हें  भूगतने  को  मिल  रहा  है। एकसमय  ऐसी स्थिति आ गई कि-" अगर ये  लोग  अपने  घर  का  फाटक  खोल  देते  तो  उनके  घर  की  तमाम  औरतें  रैयतों  के  साथ  मिल  जातीं"।

दादी एक  कहावत  कहती थीं-
" ऊँच  बड़ेडी, खोखड़ बाँस"
"कर्जा खाये  बारहो  मास"।

नरक  परलोक  में  थोड़ै  होता  है। हर हवेली  के  आँगन  में  होता  है  और  समय-समय  पर  उसका  दरवाज़ा  खुलता  है  और  हर एक  औरत  को  अपने  चपेट  में  ले  लेता  है।
दादी  अपनी  दास्तांगोई  आगे  कुछ  इस  तरह  बयान  करती  हैं-

तेरह  बरिस  में  हमरा  बियाह  होय  गये  रहा  और  जब  बियाह  के  असली  उमर  होलै  ओखनी  हम  सात  बूढ़ी  में  एक  बूढ़ी  होये  गै  रहीं। चंद्रमाधव  को  चिन्हित  करके  वह  आगे  बोलती  हैं-
"एकरा  दादा  से  हम  एको  सुख  न  जाननीं, ओकरा  खाली  मेहरारू(पत्नी) जौरे(साथ में)  सूते(सोना)  आवत  रहै"।

"जमीनदारी  के  निशा  (नशा),  सब  खेत-बधार  पतुरिया (वेश्या)और  रखैल  में  उड़ा  देलैं"।

मेरे  सामने  एक  अस्तित्व  का  संकट  खड़ा  हो  चुका  था। मैं  तो  स्वयं  का  जैसे-तैसे  निबाह  कर  रहा  था  और  दादी  ने  फिर  एक  मलामत  माथे  पर  मढ़  दिया  था।
लड़कियों  और  औरतों  का  सब  जगह  निबाह  ही  तो  किया  जाता  था। हर  जगह  मांस  के  लोथड़े  जैसा  ही  तो  उनसे  व्यवहार  किया  जाता  है। पहले  दीवारों  में  कैद  रहती  हैं, फिर  जब  बाहर  निकलती  हैं  तो  कई  किस्म  के  शिकारियों  की  नज़र  पड़ती  है।

आगे  तो  मुझे  भी  निबाह  ही  करना  था। दादी  की  स्थिति  कुछ  ऐसी  थी  की  मैं  चाहकर  भी  उनसे  कुछ  कह  न  पाया। और  कुछ  न  कहने  का  यही  मतलब  था   की " मैंने  दीपा  नाम  की  एक  महाजन  को  स्विकार  कर  लिया  था"। मेरे  विचार  उस  वक़्त  भी  ऐसे  नहीं  थे  की  किसी  लड़की  को  मैं  महाजन  बना  दूँ। पर  शायद  दीपा  मेरे  लिए  महाजन  ही  थी  एक  वक़्त।

एक  व्यक्ति  जो  खुद  अपने  भीतर  के  हजारों  अंतरद्वंदों  से  टकरा  रहा  हो, बहुत  असहज  हो, उसे  आत्महत्या  के  सवाल  परेशान  कर  रहे  हों, जो  व्यक्ति  अस्तित्व  संकट  से  जूझ  रहा  हो, उसके  लिए  एक  और  व्यक्ति  को  संभालना  शायद  सबसे  मुश्किल  कामों  में  से  एक  है।

आत्महत्या  से  जुड़े  सवाल  शायद  इतने  उलझे  नहीं  होते। उलझन  तो  अंतर्तत्वों  में  होता  है  जिनके  अधीन  एक  व्यक्ति  जी  रहा  होता  है।
इस लड़ाई  में  दो  रास्ते  हमारे  पास  होते  हैं-
" एक रास्ता  जाता  है  जिंदगी  की  तरफ तो  दूसरा  मौत  की  तरफ"।
मैंने  पहले  वाले  रास्ते  को  आत्मसात  कर  लिया।

मैं  और  दीपा  उसी  अनजान  शहर  के  एक  सुनसान  कमरे  में  साथ  रहने  लगे  थे।  हमदोनों  न  चाहते  हुए  भी  एक  साथ  रहने  लगे। शायद  साथ  रहने  के  लिए  प्रेम  का  होना  बेहद  जरूरी  होता  है।
पर  प्रेम  का  उत्सर्जन  कहाँ  से  होता है?
प्रेम  करने  के  लिए  सपने  का  होना  जरूरी  होता  है। पर  मैं  उस  लड़की  में  सपने  के  बचे  होने  की  उम्मीद  कैसे  कर  सकता  था  जो  लगातार  करीब  पंद्रह  वर्षों  तक  दीवारों  में  कैद  रही। उन  दीवारों  में  सपने  भी  उधार  ही  लिए  जाते  हैं  और  उधार  लिए  हुए  सपनों  से  कोई  प्रेम  नहीं  कर  सकता  है।
हमारे  सपनों  का  मर  जाना  सबसे  खतरनाक  तो  है  पर  सबसे  खतरनाक  होता  है  उधार  के  सपने  को  अपना  भविष्य  मान  लेना।

जिन  दीवारों  में  दीपा  कैद  रही, वहाँ  तो  मरने  तक  की  इज़ाज़त  नहीं  दी  जाती। भला  फिर  वहाँ   सपने  देखने  की  बात  कौन  सोच  ही  सकता  है? वह  दीवारे  ही  लोगों  को  अनासक्त  बना देती  है  और  लड़कियों  को  कुछ  हद  तक  विद्रोहिणी  भी।
आकाश  बहुतेरों  के  लिए  सिर्फ  एक  अतिरिक्त  चीज  हो  सकता  है,  पर  दीपा  के  लिए  आकाश  एक  अंतहीन  चीज़  है, बिल्कुल  उसकी  जिंदगी  की  तरह।
सुनसान  गलियों  के  आखिरी  मकान  में  बसे  एक  छोटे  से  कमरे  में  दीपा  का  दिन  कटता, रात  को  अंतहीन  आकाश  में  हजारों-लाखों  प्रकाशवर्ष  की  दूरी  पर  बसे  तारों  को  देखकर।  टूटते  हुए  तारों  को  देखकर  दीपा सिहर  जाती  जैसे  उसको  पता  हो  कि-" एकदिन  उसे  भी  ठीक इसी  तरह  टूटना  होगा"।

पाँच  वर्ष बीत  गये  और  धीरे-धीरे  हमारी  आर्थिक  स्थिति  में  भी  सुधार  होने  लगा। पर  इन  पाँच  पतझड़ो  के  बाद  भी   नयेपन  का  इंतज़ार  था।  पहले  तो  घटनाएं  बिन  बुलाये  आ  जाती  थीं। पर  इन  पाँच  सालों  में  बस  एक  ही  घटना  रूप  बदल-बदलकर  आती  रही  और  हम  दोनों  उनसे  जूझते  रहे  और  लड़ते  रहे।

मेरा  गाँव  आना  जाना  भी  लगा  रहा। पर  जब  मैं  गाँव  जाता  तो  ऐसा  लगता  की  इन  पाँच  सालों  में  बदलकर  भी  बहुत  कुछ  नहीं  बदला  है। सबकुछ  वही  तो  है। मेरी  माँ,  मेरी  दादी  और  सब  भी  वही  हैं। दादी  थोड़ी  और  बूढ़ी  हो  गईं , कमर से  झूक गई, आवाज़  में  जो  एक  मजबूती  थी वह  न  जाने  कहाँ  चल  गया, शरीर  के  चमड़े  भी  धीरे-धीरे  साथ  छोड़ने  लगे  थे, नैतिक  और  दिनचर्या  की  क्रियाओं  में  भी  दादी  को  माँ  का  सहारा  चाहिए  था।
उम्र  का  असर  ये  हुआ  कि " दादी  जो  पहले  धार्मिक  नहीं  थीं, अब  राम-भजन  करनें  लगीं"।

"कलयुगवा  में  राम-नाम  भज ल हो"
" बेटा-बेटी  कोई  काम  न  देतौ"
" छूट जैतो  तन  से प्राणवाँ हो"
"कलयुगवा  में  राम-नाम  भज ल  हो" ।

माँ  को  मैंने  कभी  बदलते  हुए  नही  देखा। मेरी  माँ सिली  होठों  वाली  माँ  थी। उसका  न  बोलना  ही  मेरे  लिए  लाखों  शब्द  और  भावनाएं  लिये  होता  था। माँ  के  चेहरे  को  मैं  पढ़  लेता, उनकी  आँखों  को  देखकर  पता  चल जाता  की वह  क्या  सोंच  रही  हैं। माँ
बस  इतना  हीं  कहती- " अच्छा  से  खाएल-पीयल  करीह"
" कोई  बात  के  चिंता न  करीह"
" मेहनत  के  फल  कहुँ  न  भाग  के  जायले"।

मैं  पहले  सोचता  था  कि - " हमारे  यहाँ  औरतें  बिना  काम-धाम  के  पूजा-पाठ  में  क्यों  लीन क्यों  रहती  हैं"?

अब  समझता  हूँ  की  कोई  आस्था  ही  तो  औरतों  को  उन्हें  अपने  बच्चों  से, पतियों  के  साथ  जोड़े  रखता  है। जो  औरतें  दीवारों  में  कैद  रहती  ही  उनके  लिए  सिर्फ  आस्था  ही  तो  आखिरी  रास्ता  है  अपने  आपको  जीवित  रखने  के  लिए। धर्म  को  श्रम  की  छाया  में  विलीन  किया  जा  सकता  है  लेकिन  किलेबंद  दीवारों   में  तो  सिर्फ  और  सिर्फ  घुटन, मानसिक व्यथा  और  लाचारी  है।

उस  दिन  रात  को  जब  मैं  सोने  गया  तो  एकाएक  दीपा  के  बारे  में  ख्याल  आने  लगे।
कहीं  मैंने  तो  उसका  जीवन  बर्बाद  नहीं  कर  दिया?
मेरे  अंतर्मन   ने  दस्तक  दिया-"तुम  तो  उसे  छूने  से  पहले  भी  उसके  आज्ञा  की  प्रतीक्षा  करते  हो"।

कहीं  मैने  उसे  और  गहरी  खाई  में  लेकर  तो  नहीं  चला  गया  जहाँ  से  उसका  निकल  पाना  असंभव  है।
हमारा  समाज  औरतों  के  नाम  जाने  से  पहले  उसके  रखवाले  का  नाम  जानना  चाहता  है। आखिर  दीपा  से  कोई  ऐसा  प्रश्न  पूछ  दिया  तो  वह  किसका  नाम  लेगी। वह  तो  गुंगी  गुड़िया  है  अभी  भी।  ये  सब  मेरे  चलते  ही  तो  हुआ  है। अगर  मैं  अपनी  जिम्मेदारी  से  भाग  खड़ा  हुआ  तो  दीपा  का  क्या  होगा?
रातभर  मैं  करवटें  बदल-बदलकर  अपने  आप  से  ही  टकराता  रहा, फफक-फफकर रोता  रहा।

आखिर  मैं  चंद्रमाधव  को  क्या  जवाब  दूँगा। उसे  तो  मुझमें  अपने  आपसे  अधिक  विश्वास  है। क्या  मैं  क्षण  भर  में  उस  विश्वास  की  हत्या  कर डालूँगा?
नहीं, मैं  ऐसा  नहीं  कर  सकता। तो आखिर  मैं  कर  भी  क्या  सकता  हूँ?

अगले  दिन  मुझे  शहर  निकलना  था। हमारे  यहाँ  शादियों  के  दो  समय  सबसे  बेहतर  होता  है।
" जब  आप  कुछ  नौकरी  कर रहे  हों  और  आपके  घर  मे  आर्थिक  संकट  गहरा रहा  हो"।
"जब हमारे दादा/दादी  कुछ  समय  के  बाद  अनंत  की  यात्रा  करने  वाले  हों"।

मेरे  पक्ष  में  दोनों  परिस्थितियां थीं। जब  घर  से  निकलने  वाला  था  तो  दादी  ने  बुलाकर  कुछ बातें  कहीं-
" बबुआ अब  हम जादे दिन  के  मेहमान  न  हियै, पोता  के  बियाह  देखल  बड़ी  भाग्य  के  बात रहे लै"।
" ई  साल  हाड़  में  हरदी(हल्दी) लग  जाये  के  चाहि"।

माँ  अपने  चेहरे  के  भाव  से  ही  दादी  की  बात  का  पूर्ण  समर्थन  कर  रही  थी। उसने अपने  सिले  होठ को  बंद  ही  रखना  वाज़िब  समझा।
मैं  कुछ  व्यक्त  किये  तपाक  से  निकल  गया। दादी  ने  आज  गहरा  प्रहार  किया  था।

मैं  बस  में  जब  बैठा  तो  अपने  अंदरूनी  सवालों  के   जवाब  देने  लायक  नहीं  था।

मैंने  किस-किस  को  नहीं  ठगा। चंद्रमाधव  को , दीपा  को , करूणा  से  ओतप्रोत  अपनी  माँ  को, अपनी  बूढ़ी  दादी  तक को।
  
इन्हीं  गहराते  हुए  सवालों  को  साथ  लेकर  कुछ  समय  बाद  मैं  दीपा  के  सामने  खड़ा  था। आज  दीपा  साक्षात  लक्ष्मी  की  तरह  लग  रही  थी। दीपा  बिल्कुल  उसी  तरह  मुस्कुरा  रही  थी  जैसे  मिट्टी  की   मूर्तियों  वाली  निर्जीव  लक्ष्मी  मुस्कुरा  रही  होती  हैं। आज  न  जाने  मेरे  जैसे  आस्थाहीन  व्यक्ति  को  लक्ष्मी  के  बारे  में  ख़्याल  आने  लगे। शायद  मैं  अपनी  गलतियों  का  प्रायश्चित  दीपा  को  लक्ष्मी  बनाकर  करना  चाहता  था।

दीपा  आज  बड़ी  उल्लासित थी। उसने  मुझसे  पहली  बार  कोई  मज़ाक  किया।
"आ  गये  अपनी  माँ  और  दादी  के  पास से"।
" उन्हें  मेरे  बारे  में  बताया  या  नहीं"।

दीपा  आगे  बोली-
"भगवान  जाने  मेरे  भाग्य  में  क्या  लिखा  है"?
"इन  पाँच  सालों  में  तो  बस  दो  दीवारों  की  दूरी  ही  तय  कर  पायी  हूँ"।

ये  सब  मेरे  ऊपर  फिर  चट्टान  की  तरह  गिर पड़े। मैं  कुछ  कहना  चाहता  था  पर  हिम्मत  न  कर  सका।

मुझे  आज  ऐसा  लग  रहा  था  की-" दीपा  प्रेम  करना  भी  सीख  गई   है"। दीपा  का  प्रेम  करना  सीख  जाना  मेरे  लिए  हानिप्रद  था। प्रेम में  कई  उलझे  हुए  सवाल  होते  हैं, कई  अनकहे  प्रसंग  होते  हैं। मैं  सवालों  से  डरता  था।
मैं  अपने  भीतर  एक  अजीब  सी  बेचैनी  लिये  था।

रात  को  जब  मैं  एकांत  सोया  था  तो  सहसा  मेरी  नींद  खुली। दीपा  अपने  नाखुनो  से  मेरे  केशों  को  सहला  रही  थी। एकाएक  मेरे  भीतर  एक  आत्मियता  का  भाव  जाग उठा, मेरा  रोम-रोम  पुलकित  हो  उठा। वातावरण  कुछ  ऐसा  बना  मानोकि  आज  पहली  बार  दो  व्यक्तियों  का  मिलन  होने  वाला  हो। मैं  दीपा  की  वक्षों  की गरमाहट  में  पूरी  रात  बिता  देना  चाहता  था।

पर सहसा  दीपा  ने  मेरे  कल्पनाओं  के  ऊपर  धावा  बोल  दिया।
क्या तुम मेरे  कुछ  सवालों  का  जवाब  दोगे,दीपा ने  पूछा।
मैंने कहा-"जरूर"।
"क्या तुम  मुझे  हमेशा  इसी  रूप मे देखना चाहते  हो?"
"मुझे लोग  तुम्हारी  रखैल  कहेंगे  तो  तुम्हारे  पास  क्या  उत्तर  होगा"?
"एक  कैदखाने  से  तुमने  मुझे  मुक्त  करवाया है, क्या तुम  मुझे  फिर  वहीं  धकेलना  चाहते  हो?"

मैंने  अपने  गीले  होठों  से  दीपा  के  माथे  को  चुम  लिया  क्योंकि  मैं  जवाब  देने  में  असमर्थ  था।
दीपा  के  सवालों  ने  मुझे  उस  सुनसान  गली  से  उठाकर  एक  निर्जन  वन  में  ला  खड़ा  कर  दिया  था। पर  जिस  तरह  सुनसान  घाटियों  में  सूरज  के  उगने  न  उगने  से  फर्क  नहीं  पड़ता,ठीक उसी  तरह  दीपा  के  सवालों  का  हाल  हो  गया।

पर  जब  आपको  लगे  की  आपकी  जिंदगी  एकदम  पटरी  पर  है, ठीक  उसी  समय  आपके  आसपास  सबसे  अधिक  उथल-पुथल  हो  रहा  होता  है। ठीक उसी  समय विपरित दिशा  से  एक रेल  आ  रही  होती  है  आपको  बेपटरी  करने  के लिए। मेरे  साथ  भी  कुछ  ऐसा  ही  हुआ।

मैं  क्या  कर  रहा  हूँ,  मैं  क्या  खा  रहा  हूँ, मैं  किसके  साथ  रह  रहा  हूँ, मैं  किसके  साथ  सो  रहा  हूँ, इन  बातों  का  मेरे  लिए  कोई  खास  महत्व  नहीं  था।
पर  मेरे  आस-पड़ोस  के  लिए  इन  बातों  का  एक  गहरा  महत्व  होता ।  एकदिन  मेरे  दफ़्तर  में  फोन  की  घंटी  बजती  है, कुछ  देर  बाद  मैं  वहाँ  खड़ा  कुछ  सवालों  का  सामना  कर  रहा  होता  हूल।
मेरी  दादी  बोल  रही  होती  हैं-
"बबुआ ई  का  कईल, बियाहे  करे  के  रहै  त  खबर कर देत हल, हम  न रोकतीं"
"सब करल-धरल  मिट्टी  में  मिला देल"
" कहिंयो  मुँह दिखावे लायक न छोड़ल"
"तोरा  से ई  आशा  न  रहै"
"बुढ़ापा में ई  दिन  देखे  के  मिली  कभी न सोचली हल"

मैं निश्ब्द तपते  हुए  पत्थर  की  तरह इन बातों को  अपने  भीतर  से  गुजरने  दे  रहा  था।
जब घर  आया  तो  कुछ  हल्का  महसूस  कर  रहा  था। आज  किसी  से  जैसे  एकाएक  सारे  नियमों  और  बंधनों  को  क्षण  भर  में  मेरे  भीतर से  हमेशा  के  लिए  उखाड़ फेंक  दिया  था।

अगले  दिन  मैं  अपने  गाँव  में  था। सिली  होठों  वाली  माँ  आज  मुझसे  लिपटकर  पहली  बार  रो  रही  थी। आँसुओं  की  बुँदें  माँ  से  सूखे  हुए  गालों  से  गिरकर मेरे  हाथों  से गुजरते  हुए  आंगन  की  मिट्टी  में  सोख  लिये  जा  रहे  थे।
दादी  दृढ़  थीं, शायद  समाज का  सामना  करने  को  लेकर  तैयार  थीं।
दादी आगे  बोलीं-
"मुखिया  बोल  के  गये हैं कि    जात  से  बाहर  कर देंगे"
"कह रहे  थे  की  तुम सगोत्रीय वियाह कर  लियो  हो"
"सगोत्रीय विआह  से  जात-बिरादर  का  खून गंदा  हो  जाता  है"
" हमेशा  के  लिए  गाँव  छोड़वाने  की  धमकी देकर गये  हैं"

मैं  सिर झुकाये  नि:श्बद  खड़ा  था।

मेरी  माँ  जो  कभी  नहीं  बोलती  थीं, रौद्ररूप  धारण  किये  हुई  थीं।
"मुखिया  कौन  होते  हैं  हमरा  घर  के  ठेका  लेवे ओला"
"उनखर  ठेकेदारी  कोई  और  मानी, हम काहे  मानब"
"मुखिया  से  कोई  कुकर्म  छुटल  है, उनका  त  कोई  जाति  से  बाहर  न  कर  दिया  जब  ऊ  अपने  फुफेरी  बहिन के  एको  इज़्ज़त  के  न  रहे  दिये"
"मेहरारू  के  अछैत(रहते  हुए) पाँच  को  रखैल रखे  हुए  हैं"
" हमरा  इज़्ज़त  के ऊ  कौन  होते  हैं  फैसला  करे  ओला"
"ई  हमर अपन  घर  के  बात  हैं, हम देख लेवेंगे"
" ऊ  लड़की  के  निबाह  तो  अब  करही के  पड़ी"।

मैं  गदगद  होकर  माँ  से  लिपट  कर  रो  रहा  था।
माँ  ने  मुझे  इस  काबिल  बना  दिया  था  की  मैं  दीपा  के  सवालों  का  जवाब  अब  दे  सकूँ।
मैं  मन  ही  मन  सोचे  जा  रहा  था-
" ऐ  दुनिया  तू  विकल्पहीन  नहीं  है"।

Sunday, 29 January 2017

रेणु और गाँव की याद में-2

रेणु जन्म  से  ही  विद्रोही  रहे  होंगे। तभी  तो  गाँव-अंचल  में  जिन  बातों  को  लोग  सकुचाकर  बोलते  हैं, उन  बातों  को  रेणु  ने  अपनी  कहानियों  में  जगह  दिया।
रेणु  आप  तो  किसान  थे, खेत  में  धनरोपनी करने  वाला  किसान, धान  की  मोरी  को  माथा  पर  लादकर  ढ़ोने  वाला  किसान।

आपने  जिन  पात्रों  और  लोगों  को  अपनी  कहानियों  में  जगह  दिया, वह  नहीं  जानते  की  आप  बहुत  बड़े  साहित्यार  रहे  हैं। आपकी  ही  बातो  में " यहाँ  कोई  किसी  को  नै  बुझता  है; सब  अपने आप  में  ही  बड़का  साहब  है"।

रेणु  आप  नहीं  जानते  की  आप गाँवों  में  किस  हद तक  बसे  हुए  हैं। मेरे  परदादी  जिनको  गुजरे  कुछ  दिन  बाद सत्रह वर्ष  हो  जायेंगे, उनमें  आप  बसे  थे। उन्होंने  आपका  नाम  नहीं  सुना  था।
पर  आपकी  सारी  कहानियां  उन्हें  याद  थीं। मैं नैसर्गिक  नटखट  था, फिरभी  हर  शाम  मुझे  दादी  के  हवाले  कर  दिया  जाता  और  कथा  सुनाने  के  पहले  वे  मुझसे  फूल  अर्पण  करवातीं, धूप  जलातीं  और  फिर  उसके  बाद  कहानियां  शुरू  करतीं। लालपान  की  बेगम  जो  तीन-चार  दिनों  तक  चलतीं।
कहानी  के  नायक  ने  नयी  बैलगाड़ी  खरीद ली, फिर  अपनी  मेहरिया  से  वादा  किया  कि" आज  पूरे  परिवार  के  साथ  लाखोबाई  का  नाच  देखने  चलेंगे"।  कुछ कारणवश  उसको  आने  में  देर  हो  गई  और  फिर  मेहरिया  के  नखड़े  देखने  नायक  होते।

रेणु  मैं  आपसे  एक  बात  कहना  चाहता  हूँ-
आज के  समय  में  प्यार  करना  आसान  हो  गया  है क्योंकि  अपनी  नैसर्गिक  भावनाओं  को  हमलोगों  ने  सीमित  कर  दिया  है। आपके  समय  में  प्रेम  में  प्रकृति  के  कई  विविध  रूप  देखने  को  मिलते  थे, मोहब्बत  करना  आसान  नहीं  थे, पैसे  नहीं  थे  शायद इसलिए  आसान नहीं  थे। रेणु  आप  जानते  हैं  आजकल  की  अधिकतर  प्रेम  कहानियां  क्यूबीकल  तक  सीमित  हैं। हमारी  प्रेमिकाओं  को  प्रेम  से  अधिक डोमीनोज़, के.एफ.सी  प्रिय  है।

रेणु  आपने  तो  नारे  भी  बुलंद  किये  थे-

जो  जोतेगा
सो बोवेगा
जो बोवेगा
सो  काटेगा
और  जो  काटेगा
सो  खायेगा.

रेणु  आज  इन  नारों  के  बल पर  हीं  कई  लोगों  का  निबाह  हो  रहा  है।

बचपन  में  कहानियां  बोझ  मालूम  पड़ती  थीं, पहाड़  की  तरह  है, मैं  बचकर  भागना  चाहता  था। पर रेणु  से  कैसे  कोई  भाग  सकता  है।

बचपन  में  जो  प्रेरणाएं  विष  की  तरह  थीं, आज  वहीं  अमृत  के  समान  है   मेरे  लिए।

रेणु,  आपके  जाने  के  बाद  भी  हमारा  गाँव  नहीं  बदला। हाँ, शहर  जरूर बदल गये  और  उसके  ठेकेदार  तो  हमेशा  बदलते   रहते  हैं।

हमारे  गाँवों  में  आज  भी   बाढ़   आती  है, नित्य  सुखाड़  पड़ता  है। पर  आज  भी  गाँवों  को  कोई   बचाने  नहीं  आता। लोग  अपने  बचाव  के  लिए  वही  बूढ़े  बरगद  की  शरण  में  जाते  है  और  बारीश  न  होने  पर  आजभी  रात  को  गाँव  के  सबसे  बुजुर्ग  आदमी  को  गीली  मिट्टी  से, गोबर  से  नहला  दिया  जाता   है  ताकि  गाँव  की  देवी  इंद्र  के  पास  जाकर  वर्षा  होने  की कामना  कर  सकीं।

रेणु,  आज  भी  तो  बाढ़  के  नाम  पर  कमिटियाँ  गठित  होती  हैं  और  उसके  सदस्य  जो  होते  हैं, उनके  पटना  से  लेकर  कटिहार  तक  में  हवेलियाँ  खड़ी  जो  जाती  हैं।

आपने  एक  कहानी  लिखी  थी  न," आदिम  रात्रि  की  महक" , जिसमें  एक  सेवक  अपने  स्वामी  का  बखान  करते  हुए  कभी  नहीं  थकता  है। पर  आज तो  हमसब  स्वामी  हो  गये  हैं, संत  हो  गयें  हैं  और  जो  सेवक  है  उसे  हम  आदमी  नहीं  मानते।

आपकी  जो  मुनिया , जो  चलते  हुए  मुसाफिरों  के  मन  मोहा  करती  थी, आज  उस  हर  मुनिया  में  हम  अपने  हवस  बुझाने  वाली  देह  को  देखते  हैं। आज मुनिया  घूंघट  में  भी  भय  के  मारे  काँपती  है।
रेणु, आज नींद  दस्तक  दे  रही  है। मैं  आपको  अपने  शब्दों  में  आपसे  प्रेम  करना  चाहता  हूँ।
रेणु  आप  जहाँ  भी  है " प्लीज  टेक  केयर" क्योंकि  आज  समय  बलवान  हो  गया  है, वह  आपको  मिटाने  की  साजिश  कर  रहा  है। समय गाँवों  में  भी  कंक्रीट  का  जंगल  लगाना  चाहता  है, बरगद  और  पीपल  के  पेड़ो  की  बलि  देकर।
रेणु, प्लीज टेक केयर।

रेणु और गाँव की याद मे।

फणीश्वरनाथ रेणु  के  गाँव  जैसा  ही  हमारा  गाँव  भी  है।
आखिर  वह  कौन सी चिज  है  जो  एक  कथाकार  या  साहित्यकार  को  कालजयी   बना  देती  है। भले  ही  इस बात  में  भारी  विरोधाभास  हो  सकता  है  कि"  एक साहित्य अमर  होता  है  या  उसको  लिखने  वाला  साहित्यकार"।  ठीक  उसी  तरह  यह  भी  कहा  जा  सकता है  कि "कथानक  अमर  होता  है या  कथाकार"।

मुझे  वह  दिन  आज भी  अच्छी  तरह  याद  है  जब  मैंने  रेणु  को  पहली  बार  पढ़ा  था। वह  दिन  शायद  फाल्गुन  मास  का  कोई  दिन  था  और  कहानी  थी ठेस। करीब  दस  वर्ष  पहले  रेणु  को  पढ़ा  और  उसके  बाद  गाँवों  को  छोड़कर  एक  शहर  में  आ जाना  और  फिर  उस  शहर  को  छोड़कर  फिर  एक  बड़े  शहर में; जहाँ  रेणु  की  कहानियों  के  पात्र  दूर-दूर  तक  नज़र  दौड़ाने  पर  भी  नहीं  दिखाई  देते।

पर  रेणु  को  देखने  के  लिए  और  क्या  नज़र  दौड़ाने  की  जरूरत  है?
शायद  मेरे  लिए  तो  नहीं  क्योंकि-" रेणु  को  मैं  अपने  दिल  में  लेकर  चलता  हूँ  और  अपनी  औकात  में  भी  रहता  हूँ"।

रेणु  हमारे  गाँवों  की  हवा  में  बस  गये  हैं, पतझड़  में  रेणु  बस  गये  हैं, रेणु  हर  आदिम  रात्रि  में  बस  गये  हैं। आँचलिकता  की  हर  बातों  में  रेणु  बस गये  हैं। न  सोनपुर मेला, न ही  चंपारण  के  गाँव  और  नहीं  गाँव  की  औरतें  रेणु  के  बिना  परिपूर्ण  है।

आखिर  हीराबाई  और  हीरावन  को  भूल  जाना  हमारे  लिए  आसान  है  क्या। हीरावन  और  हीराबाई  के  बीच  की  निश्छल बातें, हमारी  सभ्यता  और  वर्तमान  के  अस्तित्व  पर  चोट  करती  बातें। कैसे  सुनसान  जगह  पर एक  अनजान  औरत  को  सिर्फ  माँस  का  एक  लोथड़ा  समझ  लिया  जाता  है।
हमारे ऑटोवाले, ओला और  उबर  वाले  लोग  कितना  कुछ  सिख  सकते  हैं  हीरावन  गाड़ीवान से। आदर्श की  बातों  से  लेकर  व्यवहार  तक ।

नैना -जोगिन  कहानी  की  नायिका  जो  साक्षात  काली की  रूप  थी। उसका  एक  मर्द  से  कहना- हमको  बदनामी  से  तनिको  डर  न  लगता  है,आप  हमरा  क्या  कर  लेंगे  जी? आप  हमारा"  एथी  का  उखाड़  लीजिएगा"।

लालपान  की  बेगम कहानी  जिसमें  बैलगाड़ी  चलाने वाला आदमी  आज  शहरों  में  ऑटो  चला  रहा  है;पर  बदला  उसके  लिए  कुछ  नहीं  है। फिलिप्स रेडियो  की  जगह एल.जी  फ्लैटरॉन  ने  ले  लिया  है, देखने वाले  की  रूप  बदल  गई  है  पर  आत्मा  वही  है।

हमारा  गाँव  आज  भी  रेणु के  गाँवों  की  तरह  ही  है। वही  दालान, वही चौपाल, वही  बतकही  और  वही  गुमान  की -"यहाँ  कोई  किसी  का एथी  नहीं  उखाड़  सकता"।
मैं  नहीं   चाहता  की  समय  जैसे  संक्रमण  को  मेरा  गाँव  पर  नज़र  पड़े। समय  गाँवों  को  खोखला  कर  देगा। गाँव  ही  रेणु  है  मेरे  लिए ।

Sunday, 11 December 2016

लप्रेक

देखो न शिप्रा इंडिया कैशलेश हो गया.

शिप्रा- विप्लव मुझे ऐसे समय में तुम्हारे डैड की चिंता सबसे अधिक होती है.

विप्लव-शिपरा ऐसा क्यों,तुम तो मेरी वज़ह से ही उन्हें जान सकी हो?

हाँ,विप्लव इसीलिए तो.मुझे सपने को टूटते देखकर बड़ा डर लगता है.तुम्हारे डैड ने कैश के लिए जो इन्वेसटमेन्ट किया था तुम्हारे उपर उसको लेकर डियर.

विप्लव-वाट् डू यू मिन डियर शिप्रा?आई हार्डली अंडरस्टैंड यू डियर.

शिप्रा- डियर,इट्स सो सिंपल.मैं डौरी के बारे में कह रही थी विप्लव.तुम्हारे डैड के उस सपने का क्या होगा  जिसमें उन्होंने ने सिर्फ और सिर्फ कैश और नगदी का सपना देखा था.

विपलव- शिप्रा यू आ.र सो इग्नोरैंट.माय डैड न्यो इट रीली वेल हाऊ टू कंप्रोमाईज़.आजकल सिर्फ डौरी मैटर करता है.अगर कैश न मिला तो एक एकड़ जमीन माँग लेंगे मेरे डैड.एंड डॉन्ट यू न्यो की लास्ट पार्टी जो आये थे,वे एक बिल्डर हैं.डैड उनसे दो फ्लैट का डिमांड तो ऐटलिस्ट कर ही देंगे.ऐनिहाऊ शिप्रा औनली डौरी मैटर्स एंड नॉट इट्स फॉर्म.

शिप्रा- वेल विप्लव,ये सब बातें कितनी साधारण लगती हैं कहने में.शायद तुम्हें नहीं पता की डौरी लेने वालों से लड़कियाँ सिर्फ निबाह करती हैं,मोहब्बत तो बिल्कुल नहीं.मेरी नज़र में आज से तू एक ऑफेंडर  हो गया है.

विपलव- शिप्रा,यू आ.र सो आईडियलिस्ट.बी प्रैक्टीकल डियर.डॉरी मैटर्स.
#Dowry in the time of cashless india.

Wednesday, 13 July 2016

Democracy

The famous definition of democracy-A form of government by the people,for the people and of the people.This definition holds good even today,the only confusion is-Is it really a form of government for the people? This doubt needs a lot of analysis and therapy. It is true that of all the different forms of government, democracy is not the best but the most suitable form of governance by the government elected by the mandate of the common people.

Now,let us ask a question, can democracy be questioned?is it right to question the working of the democracy?
There are different groups of people who live in a democratic state and their needs ought to be divergent and sometimes conflicting too.Has democracy fulfilled the demands of all the people?
The adherents of democracy will surely say that the modern democracy need not any improvement and it's a fiasco to question the legacy and the workings of a democratic state.
But even the best needs improvement in order to become better than the previous.
Now,let us think about the people of a democratic state.They can be categorised as-

(1)Middle class or working class:They always think that there is not any scope for the improvement of democracy,they are the people who always think that there is always an excess democracy in our country.They are cynical of criticism and democratic means of resistance.For them nation ana government are the same.They take criticism of government as the criticism of nation.They hardly think beyond the norms set by the government according to it's vested interests.These people believes in the hegemony of leaders and the government They are the most powerful people and thus represents a particular ideology and are always close to any government as far as the matters of vote bank politics is concerned.

(2)The other class is the class of intelligensia and the intellectuals.For them there is always less democracy, they demands more and more privileges in a democracy. In nation like ours,a new sub class has emerged under this class,they are the group of liberals. Liberals are still a confused class,they see everything from the mirror of politics.They are hardly ready to accept the new ideas many times.They are always sceptic and cynical in approach towards the democracy.Robert Frost defined-Liberals as someone who would not take even his own side in an argument.They are just fond of raising questions without having a prior solution.But,they are the people who always try to make the workings of democracy more and more transparent. They act as  pressure groups.

(3)The story and reality of the third class is most tragic and disappointing.They are the poor people who hardly know anything about democracy,government and democratic principles.It is where the democracy fails.The emancipation of this class is always a litmus test for democracy. Country like ours have a very large number of people belonging to this class. The democracy has become a burden for the poors whose festival they celebrate reluctantly at an interval of 5 years.What is the use of a democracy where the poorest remain poor as always?What is the use of a democracy which has failed to fulfill the needs of a large number of people? What is the dead ends of a democracy?

Indeed,every democracy has a last frontier beyond which it needs therapy,revolutionary changes and democratic reforms.In present world the scepticism of democracy is the scepticism of-too much bureaucracy, emergence of nepotism in politics,plutocracy and the crony capitalism, the attack of dissent, interference in food habits and the interference of too much vested ideas promoted by the existing governments.
But,it is still the most suitable form of governance by the elected government and there is always a scope for more democracy.