Sunday, 29 January 2017

रेणु और गाँव की याद मे।

फणीश्वरनाथ रेणु  के  गाँव  जैसा  ही  हमारा  गाँव  भी  है।
आखिर  वह  कौन सी चिज  है  जो  एक  कथाकार  या  साहित्यकार  को  कालजयी   बना  देती  है। भले  ही  इस बात  में  भारी  विरोधाभास  हो  सकता  है  कि"  एक साहित्य अमर  होता  है  या  उसको  लिखने  वाला  साहित्यकार"।  ठीक  उसी  तरह  यह  भी  कहा  जा  सकता है  कि "कथानक  अमर  होता  है या  कथाकार"।

मुझे  वह  दिन  आज भी  अच्छी  तरह  याद  है  जब  मैंने  रेणु  को  पहली  बार  पढ़ा  था। वह  दिन  शायद  फाल्गुन  मास  का  कोई  दिन  था  और  कहानी  थी ठेस। करीब  दस  वर्ष  पहले  रेणु  को  पढ़ा  और  उसके  बाद  गाँवों  को  छोड़कर  एक  शहर  में  आ जाना  और  फिर  उस  शहर  को  छोड़कर  फिर  एक  बड़े  शहर में; जहाँ  रेणु  की  कहानियों  के  पात्र  दूर-दूर  तक  नज़र  दौड़ाने  पर  भी  नहीं  दिखाई  देते।

पर  रेणु  को  देखने  के  लिए  और  क्या  नज़र  दौड़ाने  की  जरूरत  है?
शायद  मेरे  लिए  तो  नहीं  क्योंकि-" रेणु  को  मैं  अपने  दिल  में  लेकर  चलता  हूँ  और  अपनी  औकात  में  भी  रहता  हूँ"।

रेणु  हमारे  गाँवों  की  हवा  में  बस  गये  हैं, पतझड़  में  रेणु  बस  गये  हैं, रेणु  हर  आदिम  रात्रि  में  बस  गये  हैं। आँचलिकता  की  हर  बातों  में  रेणु  बस गये  हैं। न  सोनपुर मेला, न ही  चंपारण  के  गाँव  और  नहीं  गाँव  की  औरतें  रेणु  के  बिना  परिपूर्ण  है।

आखिर  हीराबाई  और  हीरावन  को  भूल  जाना  हमारे  लिए  आसान  है  क्या। हीरावन  और  हीराबाई  के  बीच  की  निश्छल बातें, हमारी  सभ्यता  और  वर्तमान  के  अस्तित्व  पर  चोट  करती  बातें। कैसे  सुनसान  जगह  पर एक  अनजान  औरत  को  सिर्फ  माँस  का  एक  लोथड़ा  समझ  लिया  जाता  है।
हमारे ऑटोवाले, ओला और  उबर  वाले  लोग  कितना  कुछ  सिख  सकते  हैं  हीरावन  गाड़ीवान से। आदर्श की  बातों  से  लेकर  व्यवहार  तक ।

नैना -जोगिन  कहानी  की  नायिका  जो  साक्षात  काली की  रूप  थी। उसका  एक  मर्द  से  कहना- हमको  बदनामी  से  तनिको  डर  न  लगता  है,आप  हमरा  क्या  कर  लेंगे  जी? आप  हमारा"  एथी  का  उखाड़  लीजिएगा"।

लालपान  की  बेगम कहानी  जिसमें  बैलगाड़ी  चलाने वाला आदमी  आज  शहरों  में  ऑटो  चला  रहा  है;पर  बदला  उसके  लिए  कुछ  नहीं  है। फिलिप्स रेडियो  की  जगह एल.जी  फ्लैटरॉन  ने  ले  लिया  है, देखने वाले  की  रूप  बदल  गई  है  पर  आत्मा  वही  है।

हमारा  गाँव  आज  भी  रेणु के  गाँवों  की  तरह  ही  है। वही  दालान, वही चौपाल, वही  बतकही  और  वही  गुमान  की -"यहाँ  कोई  किसी  का एथी  नहीं  उखाड़  सकता"।
मैं  नहीं   चाहता  की  समय  जैसे  संक्रमण  को  मेरा  गाँव  पर  नज़र  पड़े। समय  गाँवों  को  खोखला  कर  देगा। गाँव  ही  रेणु  है  मेरे  लिए ।

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