मेरी जिंदगी में हर घटनाएं अकारण ही घटी और जैसा की मैं कह चूका हूँ कि मैं इन घटनाओं को अपने भीतर से गुजरने दे रहा था। दीपा का हाँथ मेरे हाँथ में आ जाना भी एक ऐसी घटना है जिसका ज़िक्र मैं थोड़ी देर बाद करूँगा। क्योंकि समय के साथ-साथ घटनाओं पर से रहस्यों का परदा गिरने लगा है और घटनाएं एकाएक अपने असली रूप में हमारे सामने ऐसी तीव्रता के साथ आ जाती है कि फिर हमलोग उनमें रहस्य खोजने लग जाते है। उस तीव्रता को कम करने के लिए मैं उसकी चर्चा जरूर करूँगा।
समय की नीरवता को तोड़ने के लिए उन घटनाओं को लेकर मैं स्वयं भी उत्कंठित हूँ।
लेकिन उसके पहले चंद्रमाधव की दादी के बारे में बताना चाहता हूँ। चंद्रमाधव की दादी जमीनदारों के चाहरदिवारी और किलों में बंद तमाम औरतों का प्रतिनिधित्व करती है। किले में बंद औरतें स्वभाव से विद्रोहिणी नहीं होती हैं, पूरे वातावरण की नीरवता और शितलता को अपने भीतर समेटे होती हैं किले में बंद औरतें।
पर चंद्रमाधव की दादी जन्म से ही विद्रोहीणी थी। दादी का नैहर (मायके) के एक बड़े जमीनदार के यहाँ था। जैसा की मैं पहले भी कह चुका हूँ कि- "दादी के मस्तिष्क में प्रलय का कोई शिलालेख मौजूद है, जो उन्हें अपनी जिंदगी की तमाम कठिनाइयों को सरलता के साथ व्यक्त करने की ताकत देता है"।
दादी कहती हैं- जमीनदारी तो उपरे से देखै में बड़ा ठाट-बाट जैसन लगता है, लेकिन भितर से एकदम खोखड़( खोखला ) होता है।
जमीनदारों ने अपने रैयतों के साथ जो अन्याय किया है उसका फल आज उन्हें भूगतने को मिल रहा है। एकसमय ऐसी स्थिति आ गई कि-" अगर ये लोग अपने घर का फाटक खोल देते तो उनके घर की तमाम औरतें रैयतों के साथ मिल जातीं"।
दादी एक कहावत कहती थीं-
" ऊँच बड़ेडी, खोखड़ बाँस"
"कर्जा खाये बारहो मास"।
नरक परलोक में थोड़ै होता है। हर हवेली के आँगन में होता है और समय-समय पर उसका दरवाज़ा खुलता है और हर एक औरत को अपने चपेट में ले लेता है।
दादी अपनी दास्तांगोई आगे कुछ इस तरह बयान करती हैं-
तेरह बरिस में हमरा बियाह होय गये रहा और जब बियाह के असली उमर होलै ओखनी हम सात बूढ़ी में एक बूढ़ी होये गै रहीं। चंद्रमाधव को चिन्हित करके वह आगे बोलती हैं-
"एकरा दादा से हम एको सुख न जाननीं, ओकरा खाली मेहरारू(पत्नी) जौरे(साथ में) सूते(सोना) आवत रहै"।
"जमीनदारी के निशा (नशा), सब खेत-बधार पतुरिया (वेश्या)और रखैल में उड़ा देलैं"।
मेरे सामने एक अस्तित्व का संकट खड़ा हो चुका था। मैं तो स्वयं का जैसे-तैसे निबाह कर रहा था और दादी ने फिर एक मलामत माथे पर मढ़ दिया था।
लड़कियों और औरतों का सब जगह निबाह ही तो किया जाता था। हर जगह मांस के लोथड़े जैसा ही तो उनसे व्यवहार किया जाता है। पहले दीवारों में कैद रहती हैं, फिर जब बाहर निकलती हैं तो कई किस्म के शिकारियों की नज़र पड़ती है।
आगे तो मुझे भी निबाह ही करना था। दादी की स्थिति कुछ ऐसी थी की मैं चाहकर भी उनसे कुछ कह न पाया। और कुछ न कहने का यही मतलब था की " मैंने दीपा नाम की एक महाजन को स्विकार कर लिया था"। मेरे विचार उस वक़्त भी ऐसे नहीं थे की किसी लड़की को मैं महाजन बना दूँ। पर शायद दीपा मेरे लिए महाजन ही थी एक वक़्त।
एक व्यक्ति जो खुद अपने भीतर के हजारों अंतरद्वंदों से टकरा रहा हो, बहुत असहज हो, उसे आत्महत्या के सवाल परेशान कर रहे हों, जो व्यक्ति अस्तित्व संकट से जूझ रहा हो, उसके लिए एक और व्यक्ति को संभालना शायद सबसे मुश्किल कामों में से एक है।
आत्महत्या से जुड़े सवाल शायद इतने उलझे नहीं होते। उलझन तो अंतर्तत्वों में होता है जिनके अधीन एक व्यक्ति जी रहा होता है।
इस लड़ाई में दो रास्ते हमारे पास होते हैं-
" एक रास्ता जाता है जिंदगी की तरफ तो दूसरा मौत की तरफ"।
मैंने पहले वाले रास्ते को आत्मसात कर लिया।
मैं और दीपा उसी अनजान शहर के एक सुनसान कमरे में साथ रहने लगे थे। हमदोनों न चाहते हुए भी एक साथ रहने लगे। शायद साथ रहने के लिए प्रेम का होना बेहद जरूरी होता है।
पर प्रेम का उत्सर्जन कहाँ से होता है?
प्रेम करने के लिए सपने का होना जरूरी होता है। पर मैं उस लड़की में सपने के बचे होने की उम्मीद कैसे कर सकता था जो लगातार करीब पंद्रह वर्षों तक दीवारों में कैद रही। उन दीवारों में सपने भी उधार ही लिए जाते हैं और उधार लिए हुए सपनों से कोई प्रेम नहीं कर सकता है।
हमारे सपनों का मर जाना सबसे खतरनाक तो है पर सबसे खतरनाक होता है उधार के सपने को अपना भविष्य मान लेना।
जिन दीवारों में दीपा कैद रही, वहाँ तो मरने तक की इज़ाज़त नहीं दी जाती। भला फिर वहाँ सपने देखने की बात कौन सोच ही सकता है? वह दीवारे ही लोगों को अनासक्त बना देती है और लड़कियों को कुछ हद तक विद्रोहिणी भी।
आकाश बहुतेरों के लिए सिर्फ एक अतिरिक्त चीज हो सकता है, पर दीपा के लिए आकाश एक अंतहीन चीज़ है, बिल्कुल उसकी जिंदगी की तरह।
सुनसान गलियों के आखिरी मकान में बसे एक छोटे से कमरे में दीपा का दिन कटता, रात को अंतहीन आकाश में हजारों-लाखों प्रकाशवर्ष की दूरी पर बसे तारों को देखकर। टूटते हुए तारों को देखकर दीपा सिहर जाती जैसे उसको पता हो कि-" एकदिन उसे भी ठीक इसी तरह टूटना होगा"।
पाँच वर्ष बीत गये और धीरे-धीरे हमारी आर्थिक स्थिति में भी सुधार होने लगा। पर इन पाँच पतझड़ो के बाद भी नयेपन का इंतज़ार था। पहले तो घटनाएं बिन बुलाये आ जाती थीं। पर इन पाँच सालों में बस एक ही घटना रूप बदल-बदलकर आती रही और हम दोनों उनसे जूझते रहे और लड़ते रहे।
मेरा गाँव आना जाना भी लगा रहा। पर जब मैं गाँव जाता तो ऐसा लगता की इन पाँच सालों में बदलकर भी बहुत कुछ नहीं बदला है। सबकुछ वही तो है। मेरी माँ, मेरी दादी और सब भी वही हैं। दादी थोड़ी और बूढ़ी हो गईं , कमर से झूक गई, आवाज़ में जो एक मजबूती थी वह न जाने कहाँ चल गया, शरीर के चमड़े भी धीरे-धीरे साथ छोड़ने लगे थे, नैतिक और दिनचर्या की क्रियाओं में भी दादी को माँ का सहारा चाहिए था।
उम्र का असर ये हुआ कि " दादी जो पहले धार्मिक नहीं थीं, अब राम-भजन करनें लगीं"।
"कलयुगवा में राम-नाम भज ल हो"
" बेटा-बेटी कोई काम न देतौ"
" छूट जैतो तन से प्राणवाँ हो"
"कलयुगवा में राम-नाम भज ल हो" ।
माँ को मैंने कभी बदलते हुए नही देखा। मेरी माँ सिली होठों वाली माँ थी। उसका न बोलना ही मेरे लिए लाखों शब्द और भावनाएं लिये होता था। माँ के चेहरे को मैं पढ़ लेता, उनकी आँखों को देखकर पता चल जाता की वह क्या सोंच रही हैं। माँ
बस इतना हीं कहती- " अच्छा से खाएल-पीयल करीह"
" कोई बात के चिंता न करीह"
" मेहनत के फल कहुँ न भाग के जायले"।
मैं पहले सोचता था कि - " हमारे यहाँ औरतें बिना काम-धाम के पूजा-पाठ में क्यों लीन क्यों रहती हैं"?
अब समझता हूँ की कोई आस्था ही तो औरतों को उन्हें अपने बच्चों से, पतियों के साथ जोड़े रखता है। जो औरतें दीवारों में कैद रहती ही उनके लिए सिर्फ आस्था ही तो आखिरी रास्ता है अपने आपको जीवित रखने के लिए। धर्म को श्रम की छाया में विलीन किया जा सकता है लेकिन किलेबंद दीवारों में तो सिर्फ और सिर्फ घुटन, मानसिक व्यथा और लाचारी है।
उस दिन रात को जब मैं सोने गया तो एकाएक दीपा के बारे में ख्याल आने लगे।
कहीं मैंने तो उसका जीवन बर्बाद नहीं कर दिया?
मेरे अंतर्मन ने दस्तक दिया-"तुम तो उसे छूने से पहले भी उसके आज्ञा की प्रतीक्षा करते हो"।
कहीं मैने उसे और गहरी खाई में लेकर तो नहीं चला गया जहाँ से उसका निकल पाना असंभव है।
हमारा समाज औरतों के नाम जाने से पहले उसके रखवाले का नाम जानना चाहता है। आखिर दीपा से कोई ऐसा प्रश्न पूछ दिया तो वह किसका नाम लेगी। वह तो गुंगी गुड़िया है अभी भी। ये सब मेरे चलते ही तो हुआ है। अगर मैं अपनी जिम्मेदारी से भाग खड़ा हुआ तो दीपा का क्या होगा?
रातभर मैं करवटें बदल-बदलकर अपने आप से ही टकराता रहा, फफक-फफकर रोता रहा।
आखिर मैं चंद्रमाधव को क्या जवाब दूँगा। उसे तो मुझमें अपने आपसे अधिक विश्वास है। क्या मैं क्षण भर में उस विश्वास की हत्या कर डालूँगा?
नहीं, मैं ऐसा नहीं कर सकता। तो आखिर मैं कर भी क्या सकता हूँ?
अगले दिन मुझे शहर निकलना था। हमारे यहाँ शादियों के दो समय सबसे बेहतर होता है।
" जब आप कुछ नौकरी कर रहे हों और आपके घर मे आर्थिक संकट गहरा रहा हो"।
"जब हमारे दादा/दादी कुछ समय के बाद अनंत की यात्रा करने वाले हों"।
मेरे पक्ष में दोनों परिस्थितियां थीं। जब घर से निकलने वाला था तो दादी ने बुलाकर कुछ बातें कहीं-
" बबुआ अब हम जादे दिन के मेहमान न हियै, पोता के बियाह देखल बड़ी भाग्य के बात रहे लै"।
" ई साल हाड़ में हरदी(हल्दी) लग जाये के चाहि"।
माँ अपने चेहरे के भाव से ही दादी की बात का पूर्ण समर्थन कर रही थी। उसने अपने सिले होठ को बंद ही रखना वाज़िब समझा।
मैं कुछ व्यक्त किये तपाक से निकल गया। दादी ने आज गहरा प्रहार किया था।
मैं बस में जब बैठा तो अपने अंदरूनी सवालों के जवाब देने लायक नहीं था।
मैंने किस-किस को नहीं ठगा। चंद्रमाधव को , दीपा को , करूणा से ओतप्रोत अपनी माँ को, अपनी बूढ़ी दादी तक को।
इन्हीं गहराते हुए सवालों को साथ लेकर कुछ समय बाद मैं दीपा के सामने खड़ा था। आज दीपा साक्षात लक्ष्मी की तरह लग रही थी। दीपा बिल्कुल उसी तरह मुस्कुरा रही थी जैसे मिट्टी की मूर्तियों वाली निर्जीव लक्ष्मी मुस्कुरा रही होती हैं। आज न जाने मेरे जैसे आस्थाहीन व्यक्ति को लक्ष्मी के बारे में ख़्याल आने लगे। शायद मैं अपनी गलतियों का प्रायश्चित दीपा को लक्ष्मी बनाकर करना चाहता था।
दीपा आज बड़ी उल्लासित थी। उसने मुझसे पहली बार कोई मज़ाक किया।
"आ गये अपनी माँ और दादी के पास से"।
" उन्हें मेरे बारे में बताया या नहीं"।
दीपा आगे बोली-
"भगवान जाने मेरे भाग्य में क्या लिखा है"?
"इन पाँच सालों में तो बस दो दीवारों की दूरी ही तय कर पायी हूँ"।
ये सब मेरे ऊपर फिर चट्टान की तरह गिर पड़े। मैं कुछ कहना चाहता था पर हिम्मत न कर सका।
मुझे आज ऐसा लग रहा था की-" दीपा प्रेम करना भी सीख गई है"। दीपा का प्रेम करना सीख जाना मेरे लिए हानिप्रद था। प्रेम में कई उलझे हुए सवाल होते हैं, कई अनकहे प्रसंग होते हैं। मैं सवालों से डरता था।
मैं अपने भीतर एक अजीब सी बेचैनी लिये था।
रात को जब मैं एकांत सोया था तो सहसा मेरी नींद खुली। दीपा अपने नाखुनो से मेरे केशों को सहला रही थी। एकाएक मेरे भीतर एक आत्मियता का भाव जाग उठा, मेरा रोम-रोम पुलकित हो उठा। वातावरण कुछ ऐसा बना मानोकि आज पहली बार दो व्यक्तियों का मिलन होने वाला हो। मैं दीपा की वक्षों की गरमाहट में पूरी रात बिता देना चाहता था।
पर सहसा दीपा ने मेरे कल्पनाओं के ऊपर धावा बोल दिया।
क्या तुम मेरे कुछ सवालों का जवाब दोगे,दीपा ने पूछा।
मैंने कहा-"जरूर"।
"क्या तुम मुझे हमेशा इसी रूप मे देखना चाहते हो?"
"मुझे लोग तुम्हारी रखैल कहेंगे तो तुम्हारे पास क्या उत्तर होगा"?
"एक कैदखाने से तुमने मुझे मुक्त करवाया है, क्या तुम मुझे फिर वहीं धकेलना चाहते हो?"
मैंने अपने गीले होठों से दीपा के माथे को चुम लिया क्योंकि मैं जवाब देने में असमर्थ था।
दीपा के सवालों ने मुझे उस सुनसान गली से उठाकर एक निर्जन वन में ला खड़ा कर दिया था। पर जिस तरह सुनसान घाटियों में सूरज के उगने न उगने से फर्क नहीं पड़ता,ठीक उसी तरह दीपा के सवालों का हाल हो गया।
पर जब आपको लगे की आपकी जिंदगी एकदम पटरी पर है, ठीक उसी समय आपके आसपास सबसे अधिक उथल-पुथल हो रहा होता है। ठीक उसी समय विपरित दिशा से एक रेल आ रही होती है आपको बेपटरी करने के लिए। मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ।
मैं क्या कर रहा हूँ, मैं क्या खा रहा हूँ, मैं किसके साथ रह रहा हूँ, मैं किसके साथ सो रहा हूँ, इन बातों का मेरे लिए कोई खास महत्व नहीं था।
पर मेरे आस-पड़ोस के लिए इन बातों का एक गहरा महत्व होता । एकदिन मेरे दफ़्तर में फोन की घंटी बजती है, कुछ देर बाद मैं वहाँ खड़ा कुछ सवालों का सामना कर रहा होता हूल।
मेरी दादी बोल रही होती हैं-
"बबुआ ई का कईल, बियाहे करे के रहै त खबर कर देत हल, हम न रोकतीं"
"सब करल-धरल मिट्टी में मिला देल"
" कहिंयो मुँह दिखावे लायक न छोड़ल"
"तोरा से ई आशा न रहै"
"बुढ़ापा में ई दिन देखे के मिली कभी न सोचली हल"
मैं निश्ब्द तपते हुए पत्थर की तरह इन बातों को अपने भीतर से गुजरने दे रहा था।
जब घर आया तो कुछ हल्का महसूस कर रहा था। आज किसी से जैसे एकाएक सारे नियमों और बंधनों को क्षण भर में मेरे भीतर से हमेशा के लिए उखाड़ फेंक दिया था।
अगले दिन मैं अपने गाँव में था। सिली होठों वाली माँ आज मुझसे लिपटकर पहली बार रो रही थी। आँसुओं की बुँदें माँ से सूखे हुए गालों से गिरकर मेरे हाथों से गुजरते हुए आंगन की मिट्टी में सोख लिये जा रहे थे।
दादी दृढ़ थीं, शायद समाज का सामना करने को लेकर तैयार थीं।
दादी आगे बोलीं-
"मुखिया बोल के गये हैं कि जात से बाहर कर देंगे"
"कह रहे थे की तुम सगोत्रीय वियाह कर लियो हो"
"सगोत्रीय विआह से जात-बिरादर का खून गंदा हो जाता है"
" हमेशा के लिए गाँव छोड़वाने की धमकी देकर गये हैं"
मैं सिर झुकाये नि:श्बद खड़ा था।
मेरी माँ जो कभी नहीं बोलती थीं, रौद्ररूप धारण किये हुई थीं।
"मुखिया कौन होते हैं हमरा घर के ठेका लेवे ओला"
"उनखर ठेकेदारी कोई और मानी, हम काहे मानब"
"मुखिया से कोई कुकर्म छुटल है, उनका त कोई जाति से बाहर न कर दिया जब ऊ अपने फुफेरी बहिन के एको इज़्ज़त के न रहे दिये"
"मेहरारू के अछैत(रहते हुए) पाँच को रखैल रखे हुए हैं"
" हमरा इज़्ज़त के ऊ कौन होते हैं फैसला करे ओला"
"ई हमर अपन घर के बात हैं, हम देख लेवेंगे"
" ऊ लड़की के निबाह तो अब करही के पड़ी"।
मैं गदगद होकर माँ से लिपट कर रो रहा था।
माँ ने मुझे इस काबिल बना दिया था की मैं दीपा के सवालों का जवाब अब दे सकूँ।
मैं मन ही मन सोचे जा रहा था-
" ऐ दुनिया तू विकल्पहीन नहीं है"।
No comments:
Post a Comment