मैं हर चीज को अपने अनुसार देखने की कोशीश करता हूँ।किसी से बहुत जल्द प्रभावित भी नहीं होता।हर बात को हर कोने से देखने कि कोशीश करता हूँ।मेरे भीतर भी बहुत कमियाँ हैं।अनुभव कि भी कमी है।पर मैं अपने शहर से ईतना प्यार करता हूँ कि उस शहर में मूझे कुछ कमियाँ हीं नहीं नजर आती हैं।मैं अपने शहर को हर वक्त अपने अंदर जिंदा रखता हूँ।मैं हर शहर की तुलना अपनेशहर से करता हूँ। मैं हर शहर के भीतर एक अपना शहर बना लेता हूँ और उसी शहर में जीने लगता हूँ।मेरे लिए मेरा शहर बस एक शहर नहीं होता है,शहर यादों का एक खजाना होता है।मैं अपने यादों को अपने शहर में समेटे चलता हूँ।कभि कभि ये यादें हीं तो जिंदगी की अंतीम संगिनी रह जाते है।लोग तो समय के साथ साथ छोङते चले जाते हैं पर ये शहर की यादें हीं तो हमें ऐसे वक्त में भी एक सहारा देती हैं।हमें नये लोगों से दिदार भी तो शहर में हीं होता है।पर लोग नये कहाँ मिलते हैं।नये लोग भी तो शहर के रेलमपेल भीङ का हिस्सा हीं होते हैं।पर भीङ में से हीं कुछ लोग बहुत करीब आ जाते हैं।हमें ईश्क भी तो शहर में हीं होता है।बिन शहर ईश्क कैसा।ईसलिए मैं अपने शहर को अपने भीतर संजोये रखता हूँ।
Wednesday, 23 September 2015
Saturday, 5 September 2015
पूरबिया लव
दो लोग थे।
एक लङका था और एक लङकी।
दोनों एक-दूसरे को लंबे अरसे से जानते थे।
शायद दोनों रोज हीं मिलते थे।
दोनों साथ में पिक्चर भी देखने जाते थे।
हर बात पर एक-दूसरे कि सलाह लेते।
दोस्ति ईतनी हर एक के बात पर एक को दम निकलता।
आधी रात को भी एक-दूसरे के लिए हाजीर।
दोनों लंबी लंबी यात्रायें करते।
दोनों छुट्टियों में घर भी एक साथ हीं जाते।
दोनों के आँखों में कुछ सपने थे।
लङका दुनिया बदलना चाहता था,लङकी के भी कुछे अनकहे सपने थे।
ईतनी करिबी होने के बाद भी लङके ने कभी उसे प्रपोज नहीं किया,कभी आई लव यू नहीं बोला।
लङकी ने भी कुछ ऐसा बोला।
एक दिन आधी रात को लङका अपना बैग पैक कर रहा था।
लङकी पूछती है-तू कहाँ जा रहा है।
लङका बोलता है-ऐसी जगह जहाँ से फिर कभी ना लौटना है।
लङकी बोलती है-तो मैं भी तेरे साथ चलुँगी।
फिर क्या।
दोनों चल देते हैं कभी न खत्म होने वाले सफर के लिए।