कुछ बातें ऐसी होती हैं की हम उन्हें न चाहते हुए भी अपने भीतर दबाये रखते हैं। हम नहीं चाहते की उन बातों में हवा लगे। क्योंकि हवा में ऑक्सीजन की मात्रा अधिक रहने से बातों में भी आग लगने का डर रहता है। बातें दुनिया की सबसे ज्वलनशील पदार्थों में से एक है। इसीलिए मैं बातों को संज्ञाहीन नहीं मानता।
हमारी जिंदगी में कुछ ऐसी बातें होती हैं जिन्हें हम साझा करने से हिचकिचाते है। इन्हीं बातों से फिर कहानियों का उत्सर्जन होता है। मैं आगे जो लिखूँगा अगर आपको उसमें तनिक भी विश्वास न हो तो आप मान लीजिएगा की मैं झूठ बोल रहा हूँ। वैसे भी कहानियाँ अक्सर ही झूठी हुआ करती हैं क्योंकि सच तो आज सबसे बड़ा झूठ है।
कुछ लोगों से इतना अधिक आत्मीय संबंध स्थापित हो जाता की हम उस स्थिति में एक दूसरे की आत्मा को भी भेद देते हैं। संवाद का उस वक़्त बहुत अधिक मायने नहीं रह जाता। हम बिना बोले भी एक दूसरे से निरंतर संवाद में रहते हैं। ठीक उसी प्रकार जैसे कोई पक्षी अपने मुँह में शिकार को लिये हुए अनंत आकाश में उड़ रही होती है और प्रकृति से संवाद भी कर रही होती है।
मेरे और नंदन के बीच का संबंध भी कुछ इसी तरह का था। एक ही साल में जन्म हुआ, साथ-साथ पढ़ाई की, कुछ दिनों तक हमदोनों साथ रहे भी। पर सबकुछ कुछ साल पहले एकाएक बदल गया ठीक उसी तरह जैसे सामुद्र में आये किसी भयावह सुनामी के बाद कोई तटीय शहर हमेशा के लिए बदल जाता है। मैं आजकल एक तटीय प्रदेश में ही रहता हूँ जहाँ हिचकोले आते ही रहते हैं पर शहर का प्रारूप नहीं बदल पाते।
बचपन की ओर जब भी लौटता हूँ तो नंदन की तस्वीर एकाएक उभरने लगती है और मैं उन तमाम तस्वीरों और यादों में गिरफ्तार हुए चला जाता हूँ। तस्वीरों का हमारे मस्तिष्क से मिट जाना मजबूरी के होने जैसा है। एक ऐसी मजबूरी जिसे हम मजबूर होकर भी नहीं याद करना चाहते, एक ऐसी मजबूरी जहाँ हम मजबूर होकर भी लौटना नहीं चाहते।
नंदन शायद कोई प्रकृति का नियम था जिसे मैं नहीं समझ पाया। बिल्कुल उसी तरह जैसे गैलिलियों को दुनिया नहीं समझ सकी थी। नंदन भी जिस दहलिज पर खड़ा, उसके सारे रास्तों और अर्थों के बारे में मुझे अक्सर समझाया करता। पर मेरे आँखों पर तो परदा पड़ा था। रूढ़िवाद का परदा, पितृसत्ता का भय, समाज का डर और मैं उसकी बातों को सुनकर आत्मग्लानि से भर जाता। मुझे ऐसा लगता की मैं नंदन की हत्या क्यों न कर डालूँ।
नंदन मेरे सभी साथियों में सबसे अधिक समझदार, सौम्य और सरल था। हर बात को सोच-समझकर बोलता। कविताओं, कहानियों का दीवाना था बचपन से हीं।
बचपन से चलते हुए हमदोनों किशोरावस्था में प्रवेश कर चुके थे। शारिरिक और मानसिक बदलावों ने रंग दिखाना शुरू कर दिये थे। मुझे अजीब-अजीब ख्याल आते। अपने से विपरीत लिंगों पर आकर्षण होने लगा, ख्यालों की दुनिया को और भी रफ़्तार मिला। मेरे सारे दोस्त बदल गये। बदला तो नंदन भी था। पर जिन बातों में हमलोग रूझान रखते , उन बातों में उसका जी न लगता। शाम को जब हम सभी दोस्त मिलते तो रंजना से लेकर प्रिया तक की चर्चा होती। कौन क्या पहनी हुई थी, किसमें कितना बदलाव आया है, कौन किसपे जाँ निसार करती हैं और तमाम तरह की बातें जिन्हें बताना मैं मुनासिब नहीं समझता। आज वह लड़की नहीं आई थी। आख़िर वह क्यों नहीं आई। कुछ देर में यही बातें पिरियड्स विमर्श का रूप ले लेती और सभी लोग उसपर व्याख्यान देते मानोकि उन लोगों ने ही उस प्रक्रिया को भोगा हो।
इन सब बातों के बीच नंदन एकदम चुपचाप रहता, बैखाश की नदी की तरह स्थिर। न हाँ कहता न न। जैसे मानो उसे इन सब बातों से कुछ वास्ता ही न हो। वास्ता से अधिक अपने आपसे कुछ उम्मीद ही न हो।
हमलोग दसवीं कक्षा में चले गये थे। विद्यालय की स्थिति कुछ ऐसी थी की अंग्रजी साहित्य और इतिहास एकहीं शिक्षक पढ़ाते थे। इसका मतलब यह की हमलोग गाँधी जी को ही वौर्ड्सवर्थ भी मान लेते और सेक्सपियर को नेहरू। पी.बी सेली और भगत सिंह में अधिक अंतर नहीं समझ पाये। समानता के तौर पर यही जान सके की दोनों ही पच्चीस के पहले चले गये।
"एनैमर्ड बाय योर एमपेकेबल ब्यूटी को हमलोग स्ट्रगल फॉर स्वराज मान बैठे"
"ब्रेकप और बंगाल विभाजन में अंतर न समझ सके"।
अजॉय सर जो दोनों विषयों को एक तरह ही पढ़ाते थे। इतिहास पढ़ाते तो ऐसे-ऐसे टर्म्स लाते की दिमाग खूल जाता। क्लास-स्टर्गल , क्लास डिफरेंस। सर ने एक चैप्टर पढ़ाया था- " इंडस्ट्रीयल रीवोल्यूसन एंड इट्स इंपैक्ट ऑन द वर्ल्ड"। पूरा चैप्टर निकल गया और मैं दो शब्द ही सीख सखा, क्लास स्ट्रगल एंड क्लास डिफरेंस। और सर का प्रिय वाक्य-" द हिस्ट्री ऑफ ह्यूमन सिविलाइजेशन इज द हिस्ट्री ऑफ क्लास स्ट्रगल"।
पर अजॉय सर जिस सरलता से पढ़ाते थे, वैसा पढ़ाने वाला व्यक्ति मुझे कभी नहीं मिला। हरेक छात्र से जुड़े रहते और हाँथ खोलकर मार्क्स भी देते। कभी-कभार तो लोगों को इतना मिल जाता की उतना लोग लिख के न आते।
कोई दोस्त का या एक या दो नंबर कम रहता तो वह बोलता-
" ये अजैया भी पगला है एकदम, तुम तो बोल रहे थे। की तुम 75 का ही लिखे हो, फिर 78 कैसे आ गया"। फिर जब स्कूल से निकला उसके बहुत सालों बाद समझ आया कि-" सर वांट्स टू एलिमिनेट द क्लास डिफरेंस एमंग हिज़ स्टूडेंट्स"।
नंदन सर का प्रिय छात्र था। हर जब क्लास से बाहर जाते तो वह भी उनके पास जाता और बहुत आत्मियता से बातें करता। अजॉय सर के हर क्लास का नंदन बेसब्री से इंतज़ार करता।
जो लोग अधिक आत्मियता से बातें करते हैं, उनके बारे में अफवाहें भी अधिक फैलती हैं। स्कूल का पूरा समय अफवाहों से भरा पड़ा रहता। हर घंटे अफवाहों की मंडियाँ लगती और वहाँ मोल-भाव करके उनका दाम लगाया जाता। अजॉय सर के बारें में यह अफवाह फैला-" अजैया तो अपने उम्र से पंद्रह साल छोटी लड़की के साथ रहता है"।
फिर एक आवाज़ आयी-" हम तो उसको एकदिन भट्टाचार्य रोड पर देखे ही थे, स्ट्राबेरी फ्लैवर खिला रहा था उसको"।
एक और आवाज आयी-
" हाँ, मैंने भी देखा था दोनों को फन्नी घोष लेन पर, एकदम सटकर घुसूर-फुसूर न जाने क्या बतिया रहा था"।
"बतियाएगा का क्या, अपना खुराकी बता रहा होगा"।
फिर कई आवाजें आयीं-
मैंनें भी....मैंने भी...मैंनें भी।
आज अजॉय सर का चरित्र-प्रमाण पत्र बनने वाला था । बस गवाहों के सारे बयानातों को कलमबंद किया जा रहा था।
फिर किसी की आवाज़ आयी-" बड़ा रसिक निकला ये तो बे"।
अफवाहों के बाद हमारे भीतर से जो डर होता है वह या तो चला जाता है या भयानक तरीके से अपना विस्तृत रूप धारण कर लेता है।
अगले दिन अजॉय सर क्लास में आते हैं और उसके बाद पीछे से कई आवाजें आती हैं।
"सर हिट्स सिक्स"
"वेल प्लेड सर"
"वाट् एन ऐग्रेसीव शॉट सर"।
हमलोगों के लिए सबकुछ क्रिकेट ही था। अश्लीलता के कोड वर्ड से लेकर गालियों तक में क्रिकेट का हीं कोड वर्ड होता। इन्हीं अफवाहों के बीच हमलोग स्कूल से भी। निकल गये, युनिवर्सिटी भी पास हो लिये। आधे दोस्त उसी जगह पर रह गये, कुछ लोग बाहर भाग गये, कुछ लोग विलुप्त ही हो गये।
पर हमलोग जब भी मिलते अजॉय सर वाली बात निकलती और फिर उन लड़कियों के बारे में जिनके घर पर दिन में ही बारात लगा देने की कसमें कई दोस्तों ने खाये थे।
"अरे! यार, वो लड़की तो दिखी ही नहीं बोर्ड एग्जाम के बाद"।
" अरे! मैंने तो उसे जू के पास देखा था, किसी का वेट कर रही थी।"
" अरे! वो कैसे कमिटेड हो गई यार, आई लॉस्ट द बेट"।
इन सब बातों के बीच हमलोग एकदम बदल गये थे, एक आक्रामक रफ़्तार के साथ। पर एक लड़का आज भी नॉर्थ स्टार(ध्रुव तारा) की तरह ही था। नंदन आज भी इन बातों में दिलचस्पी नहीं लेता। मानो इस दुनिया की कोई भी चीज़ नंदन के लिए न हो। अकेले रहना उसने जैसे चुन लिया था।
मैं मिलने पर उससे कहता-
" यार, इंटरेस्ट जगाओ, ऐसे कब तक चलेगा"।
वह सुनकर भी अनसुना कर देता। इतनी कम उम्र में ही बेहद तनाव की जिंदगी जीता।
एकदिन ऐसे घूमते-घूमते ही नंदन ने मुझसे कुछ कहा।
"यार, तू तो मुझे समझता है न"।
मैंने कहा -"नहीं", तुझे तो पैदा करने वाला भी नहीं समझ सकता।
उसका चेहरा लाल हो गया।
मैंने कहा-
"आई अंडरस्डैंट यू डियर"।
क्या बात है बताओ।
उसने कुछ देर विराम लेकर कहा-
"तुम्हें अजॉय सर याद हैं"।
मैंने तपाक से जवाब दिया-
" अरे! वही अजॉय सर न....।"
उसका चेहरा उतर गया।
मैंने रूककर कहा-
"तुझे क्या हुआ"?
यार मुझे कोई नहीं समझता, मैं जिस तनाव में जीता हूँ उतना में तुम्हारा दिमाग बंद हो जायेगा। आख़िर मैं अपनी बातों को किससे बताऊँ। घरवाले समझते ही नहीं। माँ को एकबार बताया था, उसके बाद पापा ने जो तुफान मचाया उसको यादकर मेरा दिल दहल जाता है।
मैंने कहा-
"सीधा-सीधा बता न गुगली क्यों फेंके जा रहा है तबसे"
यार तुम सिरियस होगे तब तो बताऊँ। तुम मेरा मजाक तो नहीं न करोगे।
अरे! बिल्कुल नहीं, मैं अपने पापा की कसम खाकर कहता हूँ , एकदम मज़ाक नहीं करूँगा।
पक्का न!!
हाँ, पक्का।
यार, अजय सर जो हैं न।।।
हैं तो, आगे भी कुछ बोल।
यार!!! आई ऐम इन लव विथ हिम।
कुछ देर के लिए मुझे काठ मार गया। मैं सन्न रह गया। जैसे किसी ने मुझे घर से लाकर किसी अनजान चौराहे पर तमाशा दिखाने के लिए खड़ा कर दिया हो।
मैंने फिर मज़ाक किया-
अबे! तुम न ये ऑस्कर वाइल्डवा को पढ़कर पगला गये हो। और कुछ बात नहीं है।साले फैंटेसी से निकलो। जेल में चले जाओगे।
मैंने देखा एकाएक उसका चेहरा लाल हो गया, आँखों में आँसू आ गये उसके। जिस आदमी से हर बात पर मैं सलाह माँगता , उसको ऐसे मजबूर देखकर मैं भी हिल गया।
आगे मैंने कहा-" तुमने जिस रास्ते को चुना है, तुम्हें वहाँ से लौटना ही होगा"।
मैं कैसे लौट सकता हूँ। तुम जो लौटने की बात करते हो वह प्रकृति के नियमों को चुनौती देने वाला है। अगर मैं अजॉय से प्यार करता हूँ तो इसमें मेरी क्या गलती है। लड़कियों की ओर अगर मेरा आकर्षण नहीं है तो इसमें मेरा क्या गुनाह है। इस बात को मैं किसी को कैसे समझा सकता हूँ।
और तो और जब मैंने अपनी माँ से इस बात को शेयर किया तो कुछ दिनों के बाद हीं उन्होंने एक लड़की से शादी ठीक कर दी। उस लड़की का मैं क्या करूँगा। मैं कैसे उनलोगों को समाऊँ की मैं कोई काम पिपासु नहीं हूँ। यार, मैं उस लड़की की जिंदगी नहीं बर्बाद कर सकता।
मैं तुम्हें उसका नंबर दे रहा हूँ। तू उसे सब सीधा-सीधा बता देना।
मैंने कहा -"यार, सब ठीक हो जायेगा"
"इन द लांग रन वन गेट्स यूज्ड टू एवरीथिंग"
उसने मुझे दुत्कारते हुए कहा-" तुममे से कोई भी आदमी नहीं है"
"इन द लांग रन ऑल आर डेड"।
एक कागज़ पर दस अंक लिखे हुए थे। अंक नहीं किसी की जीवन रेखा।
अगले दिन हीं मैं वापिस आ गया और ऑफिस के कामों में ठीक उसी तरह रम गया न चाहते हुए भी मार के डर से गदहे कपड़े लादने के काम में बस जाता है। करीब एक सप्ताह बीत गये, वह कागजरूपी जीवनरेखा मेरी जेब़ में जस का तब तस वैसे ही पड़ा रहा जैसे रक़्त में जोंक पड़ा रहता है, एक अंतहीन आशा में।
उस रात को मैंने कुछ पढ़ना चाहा। जैसे ही पढ़ने बैठा, फोन रिंग देने लगा।
मैंने रिसिव किया। माँ घबरायी हुई आवाजों में बोल रही थी- बेटा!!!!
हाँ, माँ क्या हुआ बोलो।।
बेटा।।। नंदन ने सुसायड कर लिया।
कुछ देर मैं वही टेबल पर सन्न होकर बैठा था और किताबों के पन्ने से कुछ शब्द की आकृति उभर रही थी।
"तुम्हारी प्रेरणाओं से मेरी प्रेरणा इतनी भिन्न है"
" कि तुम्हारे लिये जो अमृत है, मेरे लिये वह विष है"।