रेणु जन्म से ही विद्रोही रहे होंगे। तभी तो गाँव-अंचल में जिन बातों को लोग सकुचाकर बोलते हैं, उन बातों को रेणु ने अपनी कहानियों में जगह दिया।
रेणु आप तो किसान थे, खेत में धनरोपनी करने वाला किसान, धान की मोरी को माथा पर लादकर ढ़ोने वाला किसान।
आपने जिन पात्रों और लोगों को अपनी कहानियों में जगह दिया, वह नहीं जानते की आप बहुत बड़े साहित्यार रहे हैं। आपकी ही बातो में " यहाँ कोई किसी को नै बुझता है; सब अपने आप में ही बड़का साहब है"।
रेणु आप नहीं जानते की आप गाँवों में किस हद तक बसे हुए हैं। मेरे परदादी जिनको गुजरे कुछ दिन बाद सत्रह वर्ष हो जायेंगे, उनमें आप बसे थे। उन्होंने आपका नाम नहीं सुना था।
पर आपकी सारी कहानियां उन्हें याद थीं। मैं नैसर्गिक नटखट था, फिरभी हर शाम मुझे दादी के हवाले कर दिया जाता और कथा सुनाने के पहले वे मुझसे फूल अर्पण करवातीं, धूप जलातीं और फिर उसके बाद कहानियां शुरू करतीं। लालपान की बेगम जो तीन-चार दिनों तक चलतीं।
कहानी के नायक ने नयी बैलगाड़ी खरीद ली, फिर अपनी मेहरिया से वादा किया कि" आज पूरे परिवार के साथ लाखोबाई का नाच देखने चलेंगे"। कुछ कारणवश उसको आने में देर हो गई और फिर मेहरिया के नखड़े देखने नायक होते।
रेणु मैं आपसे एक बात कहना चाहता हूँ-
आज के समय में प्यार करना आसान हो गया है क्योंकि अपनी नैसर्गिक भावनाओं को हमलोगों ने सीमित कर दिया है। आपके समय में प्रेम में प्रकृति के कई विविध रूप देखने को मिलते थे, मोहब्बत करना आसान नहीं थे, पैसे नहीं थे शायद इसलिए आसान नहीं थे। रेणु आप जानते हैं आजकल की अधिकतर प्रेम कहानियां क्यूबीकल तक सीमित हैं। हमारी प्रेमिकाओं को प्रेम से अधिक डोमीनोज़, के.एफ.सी प्रिय है।
रेणु आपने तो नारे भी बुलंद किये थे-
जो जोतेगा
सो बोवेगा
जो बोवेगा
सो काटेगा
और जो काटेगा
सो खायेगा.
रेणु आज इन नारों के बल पर हीं कई लोगों का निबाह हो रहा है।
बचपन में कहानियां बोझ मालूम पड़ती थीं, पहाड़ की तरह है, मैं बचकर भागना चाहता था। पर रेणु से कैसे कोई भाग सकता है।
बचपन में जो प्रेरणाएं विष की तरह थीं, आज वहीं अमृत के समान है मेरे लिए।
रेणु, आपके जाने के बाद भी हमारा गाँव नहीं बदला। हाँ, शहर जरूर बदल गये और उसके ठेकेदार तो हमेशा बदलते रहते हैं।
हमारे गाँवों में आज भी बाढ़ आती है, नित्य सुखाड़ पड़ता है। पर आज भी गाँवों को कोई बचाने नहीं आता। लोग अपने बचाव के लिए वही बूढ़े बरगद की शरण में जाते है और बारीश न होने पर आजभी रात को गाँव के सबसे बुजुर्ग आदमी को गीली मिट्टी से, गोबर से नहला दिया जाता है ताकि गाँव की देवी इंद्र के पास जाकर वर्षा होने की कामना कर सकीं।
रेणु, आज भी तो बाढ़ के नाम पर कमिटियाँ गठित होती हैं और उसके सदस्य जो होते हैं, उनके पटना से लेकर कटिहार तक में हवेलियाँ खड़ी जो जाती हैं।
आपने एक कहानी लिखी थी न," आदिम रात्रि की महक" , जिसमें एक सेवक अपने स्वामी का बखान करते हुए कभी नहीं थकता है। पर आज तो हमसब स्वामी हो गये हैं, संत हो गयें हैं और जो सेवक है उसे हम आदमी नहीं मानते।
आपकी जो मुनिया , जो चलते हुए मुसाफिरों के मन मोहा करती थी, आज उस हर मुनिया में हम अपने हवस बुझाने वाली देह को देखते हैं। आज मुनिया घूंघट में भी भय के मारे काँपती है।
रेणु, आज नींद दस्तक दे रही है। मैं आपको अपने शब्दों में आपसे प्रेम करना चाहता हूँ।
रेणु आप जहाँ भी है " प्लीज टेक केयर" क्योंकि आज समय बलवान हो गया है, वह आपको मिटाने की साजिश कर रहा है। समय गाँवों में भी कंक्रीट का जंगल लगाना चाहता है, बरगद और पीपल के पेड़ो की बलि देकर।
रेणु, प्लीज टेक केयर।