पीछले कुछ समय में आस-पास बहुत कुछ बदला है।नये लोगों से मिलना हुआ है,उनसे लंबी-लबी बातें हुई है।कभी ऐसा लगता है की पीछले कुछ समय में बहुत लोगों के सोच में एक भयानक परिवर्तन आया है।परिवर्तन राजनितिक रूप से आया है,सांप्रदायिक रूप से आया है।अक्सर लोग संप्रदाय विशेष को राजनीति से जोड़कर बात का बतंगड़ बना देते हैं।
कुछ दिन पहले असहिष्णुता का मुद्दा छाया हुआ था।लोग बताने में लगे थे कि कौन कितना सहिष्णु और कितना असहिष्णु है।इस मुद्दे को भी सांप्रदायिक रंग दिया गया था।
लोग इस तरह के प्रश्न पूछ रहे थे-
~क्या एक मुसलमान के मरने से असहिष्णुता आ गया देश में।
~क्या देश में ऐसा माहौल पहले कभी नहीं आया,तब ये लेखक लोग कहाँ थे?
~1984 सिख दंगा के समय ये लोग कहाँ थे?
~जब कश्मिरी पंडित पर अत्याचार हो रहा था,तब ये लोग कहाँ थे।
गौर करने पर पता चलता है की ऐसे सवाल करने वाले लोगों का एक विशेष वर्ग से अलगाव रहा है और एक विशेष वर्ग से विशेष लगाव भी रहा है।
मेरा कुछ प्रश्न है-
~भारतीय स्वतंत्रता संग्राम कि पहली लड़ाई 1857 में ही क्यों हुई,उसके पहले भी भारत के लोग त्रस्त थे?
~अंग्रेज भारत छोड़कर 1947 में ही क्यों गये?
ये सवाल थोड़े बेतुके लग सकते हैं,पर जबाव तलाशना हीं होगा।
मैं एक व्यक्तिगत बात बताना चाहता हूँ।मेरा एक दोस्त है,राजस्थान का,मुसलमान है।बेहद सरीफ बंदा,खाने में शुद्ध शाकाहारी,कोई चीज से परहेज भी नहीं करता।एक दिन बातों-बातों में हीं मैंने एक सवाल दाग दिया-
क्या तुम्हें लगता है की पीछले कुछ समय में एक संप्रदाय विशेष के खिलाफ में कुछ माहौल पनपा है?
थोड़ी देर सोचकर वह बोलता है-यार,तुम इस बात को जानते हो,फिर भी ऐसे सवाल दागते हो।
वह आगे बोलता है-हाँ,यार लोग अब एक-दूसरे को ज्यादा संदेह से देखने लगे हैं।हमें हर बार,हर जगह,हर बात का प्रमाण देना पड़ता है।हमें तो देशभक्ति का आँबजेक्सन सर्टिफिकेट दे दिया गया है।
आगे वह कुछ नहीं बोलता है।
आगे मैं भी कुछ नहीं पूछता।
यह सही है कि हमारे आस-पड़ोस में आज भी कट्टर लोग कम हीं है,पर हमारी चुप्पी ही उन लोगों को बढावा देती है और हमें ऐसा लगने लगता है कि वे बहुसंख्यक हो चले हैं।हमें बोलना होगा.ऐसे तत्वों के खिलाफ में,हमें लड़ना होगा छद्म धार्मिक कट्टरपंथों से,हमें उनके बात का जबाव देना होगा ।
हमें जानना और समझना होगा की-
~ हमारे ईश्वरों और पैगंबरों को अपनी रक्षा के लिए लठैतों की जरूरत नहीं है।