Friday, 25 December 2015

मैं छद्म तो तुम क्या?

पीछले कुछ समय में आस-पास बहुत कुछ बदला है।नये लोगों से मिलना हुआ है,उनसे लंबी-लबी बातें हुई है।कभी ऐसा लगता है की पीछले कुछ समय में बहुत लोगों के सोच में एक भयानक परिवर्तन आया है।परिवर्तन राजनितिक रूप से आया है,सांप्रदायिक रूप से आया है।अक्सर लोग संप्रदाय विशेष को राजनीति से जोड़कर बात का बतंगड़ बना देते हैं।
कुछ दिन पहले असहिष्णुता का मुद्दा छाया हुआ था।लोग बताने में लगे थे कि कौन कितना सहिष्णु और कितना असहिष्णु है।इस मुद्दे को भी सांप्रदायिक रंग दिया गया था।
लोग इस तरह के प्रश्न पूछ रहे थे-
~क्या एक मुसलमान के मरने से असहिष्णुता आ गया देश में।
~क्या देश में ऐसा माहौल पहले कभी नहीं आया,तब ये लेखक लोग कहाँ थे?
~1984 सिख दंगा के समय ये लोग कहाँ थे?
~जब कश्मिरी पंडित पर अत्याचार हो रहा था,तब ये लोग कहाँ थे।
गौर करने पर पता चलता है की ऐसे सवाल करने वाले लोगों का एक विशेष वर्ग से अलगाव रहा है और एक विशेष वर्ग से विशेष लगाव भी रहा है।

मेरा कुछ प्रश्न है-
~भारतीय स्वतंत्रता संग्राम कि पहली लड़ाई 1857 में ही क्यों हुई,उसके पहले भी भारत के लोग त्रस्त थे?
~अंग्रेज भारत छोड़कर 1947 में ही क्यों गये?
ये सवाल थोड़े बेतुके लग सकते हैं,पर जबाव तलाशना हीं होगा।

मैं एक व्यक्तिगत बात बताना चाहता हूँ।मेरा एक दोस्त है,राजस्थान का,मुसलमान है।बेहद सरीफ बंदा,खाने में शुद्ध शाकाहारी,कोई चीज से परहेज भी नहीं करता।एक दिन बातों-बातों में हीं मैंने एक सवाल दाग दिया-
क्या तुम्हें लगता है की पीछले कुछ समय में एक संप्रदाय विशेष के खिलाफ में कुछ माहौल पनपा है?
थोड़ी देर सोचकर वह बोलता है-यार,तुम इस बात को जानते हो,फिर भी ऐसे सवाल दागते हो।
वह आगे बोलता है-हाँ,यार लोग अब एक-दूसरे को ज्यादा संदेह से देखने लगे हैं।हमें हर बार,हर जगह,हर बात का प्रमाण देना पड़ता है।हमें तो देशभक्ति का आँबजेक्सन सर्टिफिकेट दे दिया गया है।
आगे वह कुछ नहीं बोलता है।
आगे मैं भी कुछ नहीं पूछता।

यह सही है कि हमारे आस-पड़ोस में आज भी कट्टर लोग कम हीं है,पर हमारी चुप्पी ही उन लोगों को बढावा देती है और हमें ऐसा लगने लगता है कि वे बहुसंख्यक हो चले हैं।हमें बोलना होगा.ऐसे तत्वों के खिलाफ में,हमें लड़ना होगा छद्म धार्मिक कट्टरपंथों से,हमें उनके बात का जबाव देना होगा ।
हमें जानना और समझना होगा की-
~ हमारे ईश्वरों और पैगंबरों को अपनी रक्षा के लिए लठैतों की जरूरत नहीं है।

Friday, 11 December 2015

क्लासरूम की कुछ यादें।

कभी कभी मन एन.आई.टी,रायपुर की क्लासेज से निकलकर डी.ए.वी आरा के क्लासेज की ओर चला जाता है,कितना कुछ सीखा था मैंने वहाँ।
खासकर पापा के हिस्ट्री और पौलिटीकल साइंस की क्लासेज में।पापा से क्लास में बैठकर पढना एक अलग खुशनूमा अनुभव रहा है मेरा।हमदोनों को एक-दूसरे के प्रति कितना संयम बनाये रखना होता था,वो बोलते थे,मैं सुनता और सीखता था।
वो क्लास में सिर्फ पढा नहीं रहे होते थे,बल्कि खुद भी पढ रहे होते थे।वो आज भी कहते हैं की-जिस भी दिन,जिस भी कारनवश मैं अपने छात्रों को पढना बंद कर दूँगा,मैं एक शिक्षक नहीं,बस एक सिलेबस कंटेंट सप्लायर बनकर सिमट जाऊँगा।
एक शिक्षक को भी निरंतर धैर्य के साथ पढना पड़ता है,अपने छात्रों को पढना होता है।जिस दिन यह काम बंद,आप एक शिक्षक से सिमटकर एक सिकंस बन जाऐंगे।
परखना होता है,कमजोर बच्चों के गुणों को,उनके भावनाओं को,शिक्षक वही जो साधारण को भी असाधारण बना दे।पापा कहते हैं की टाँपर बच्चों को कोई भी शिक्षक नहीं पढा सकता,उनका तो बस मार्गदर्शन करना होता है,पढाया तो जाता है साधारण या मध्यमवर्गीय छात्रों को हीं।
इतिहास बोध का  ज्ञान आपके क्लास में हीं प्राप्त हुआ,मैंने तो बस पढा,उसका बोध तो आपने हीं करवाया।इतिहास जैसे बोरिंग हो जाने वाले सब्जेक्ट को भी आपने मनोरंजक बना दिया।आपका कहना है की बगैर अपने इतिहास को पढे और जाने हम विकसित हो ही नहीं सकते,हाथ में आ.ई. फोन रखने से,बड़े अपार्टमेंट में रहने से,मर्सिडिज में घूमने से हम विकसित नहीं हो जाते हैं।विकसित होने के लिए हमें विषयबोध के बोध से गुजरना होता है,मानव के इतिहास को जानना होता है,उससे सीखना होता है।
आपकी फ्रेंच क्राँति पर लंबे-लंबे लेक्चर,ज्याँ जैक्स रूसो,वोल्टायर,जौन लौकी,मौंनटेंस्क्यू के योगदानों को समझाना आज भी याद है।इनके विचारों के प्रासंगिकता को आज के समय.में परिलिक्षीत करना।फिर रूसी क्रांति का लाल दौर,स्टालीन और भी क ई।
समकालीन भारतीय इतिहास को तो आपने इतनी अच्छी तरह बताया की मैं आपसे दावा कर सकता हूँ की-इस विषय पर आपसे भी अधिक लेक्चर दे सकता हूँ।इतिहास को आपने रोजाना की चीजों से कनेक्ट कर दिया।
पौलिटीकल साइंस में भारतीय संविधान,राजनितिक पार्टियाँ और उनके स्वभाव,आंदोलनों के महत्व आदि को आप के क्लास में हीं बैठकर समझ पाया।
अगर वक्त फिर से ज़रा मोहलत दे  तो आपके क्लास में लौटना पसंद करूँगा,पर वक्त की भी कुछ अजीब हीं माँग है।न लौटता है,न लौटने देता है।
आज भी आप कहते हैं की बिपन चंद्रा,इरफान हबीब,गुहा,रोमिला थापर की पुस्तकें जरूर पढना,अगर समय मिले तो।आप हमेशा मेरे अंदर क्लासरूम बनकर मौजूद रहते हैं।