शायद मैं बस मैं नहीं हूँ,आप मेरे भीतर हर जगह हैं।
कुछ भी करता हूँ या करना चाहता हूँ तो सबसे पहले आपकि स्म्रिति आति है।
आपके बारे में हीं सोचने लगता हूँ।
आपके ढेर सारे डायलाॉग दिमाग में कौंधने लगते हैं।
आपकी कही बातें याद आनें लगती हैं।
आप मेरे अंदर ईतनी गहराई से क्युँ बसी हुई हैं?
मेरे हर व्यक्तिगत फैसलों के भीतर भी आप हीं क्युँ होती हैं?
मेरे हर बातों में आप हीं क्युः होती हैं?
आप अगर मेरे अंदर ईतना गहरा न रहती तो मैं भी औरों की तरह हीं रह जाता।
आप एक कठोर पित्रिस्त्तामक समाज से निकलने के बावजूद भी ईतनी आजाद कैसे हैं?
आप अपने अधिकारों को लूकर ईतनी सश्क्त कैसे हैं?
आप तो बेटा और बेटी के बीच के अंतर हीं नहीं जानती जो की आपके समय में सबसे पहले बताया जाता होगा।
आप तो दोनों को समान समझती हैं।
आपने अपने विचार को हमारे ऊपर कभी थोपने कि कोशीश हीं नहीं की।
मैं आपके भगवान का आपके सामने मजाक करता फिर भी आप कुछ न बोलती,आपका उस पत्थर में विश्वास बना रहता है।
पर मैं जानता हूँ कि उस पत्थर के सामने आप हमारे लिए हीं खङी होती हैं।
आप जो भी करती हैं वो हमारे लिए हीं करती हैं।
ईसलिए आप मेरे भीतर ईतनी गहराई से बसी हैं।
कभी सोचता हूँ कि मेरे भीतर आप अगर न होतीं तो मैं कैसा होता,पर ईसके आगे सोचते कि शक्ति हीं खत्म हो जाति है।