अक्सर ही मैंने देखा है की मध्यम आय आय वाले घर की लड़कियां दो वजहों से पढति हैं-एक तो बस खानापूर्ति करने के लिए और नहीं तो जब वे पढति हैं तो न उनके लिए दिन होता है और न ही रात.वे बस पढति ही जाती हैं.सारे आकाश और पाताल को एक करके,बिना चुनौतियों से घबराये.कुछ ऐसी ही बातें मेरे पापा भी बोला करते थे,अपने वर्षों के अनुभवों के बाद.पापा जब ग्रेजुएशन में थे तो उनके बैच की टॉपर लड़कियां ही थीं.और पापा एक बात और अक्सर कहा करते थे-इन टाँपर लड़कियों की उम्र बहुत कम होती है.इसका मतलब मैं आजतक नही समझ पाया.बस सोचता हूं की जरूर किसी टॉपर लड़की ने पापा का दिल तोड़ा होगा.
हुआ यूं था कि गर्मी कि छुट्टियों के बाद हमारे स्कूल खुल गये थे और हमसब फिर से वापस उसी जगह आ चूके थे,सबकुछ बिल्कुल पहले जैसा ही था.कैमेस्ट्री वाले सर उसी तरह आते और पढ़ाकर चले जाते थे,फिजिक्स में फिर से इलेक्ट्रोस्टैटिक के कंसेपट्स को दोबारा समझाया जा रहा था.अंग्रेज़ी वाले सर आज भी अंग्रेज़ी के नाम पर हमें ठग की रहे थे,वे पूरी क्लास कोई भी भाषा बोल लेते थे,पर अंग्रेज़ी कभी नही बोलते.बस एक माकूल परिवर्तन ये आया था कि-तीसरे कॉलम की तीसरी सिट पर एक अनजान लड़की आकर बैठ गई थी उस दिन.उस दिन वह बेहद.शांत-शांत सी थी,शायद लोगों को परख रही थी,समझने की कोशिश कर रही थी.एक हफ्ते के भीतर उसने हमारे कक्षा के माहौल को ही उसने बदल दिया था,अब हम लोग भी डिबेट और डिस्कसन जैसी चीजों को समझने लगे थे.उसने मुर्दे घाटी जैसे सुनसान रहने वाले क्लास में एक नई ऊर्जा का संचार कर दिया था.मुझे ऐसा लगता था की फिजिक्स वाले सर उससे बहुत नाराज रहते थे,उनकी नाराजगी की कोई वजह नही थी.वे ऐसा नही चाहते थे की कोई लड़की उनसे सवाल करे और उनके द्वारा पूछे गये प्रश्नों का खट से जबाव दे दे.सर,बहुत रूढ़िवादी थे,एक दिन सर ने उसे बेवजह इतना जलील किया था कि सारे लोग दहल गये थे.उसके बाद से वह क्लास में शांत ही रहती.उस दिन के बाद ऐसा लगता था की जैसे वह किसी से खुन्नस खाये रहती,उसे ये दुनिया बिल्कुल अच्छी नही लगती थी.
मैंने पहले एक-दो मर्तबा उससे बात की होगी,पर बात का सिलसिला फिजिक्स के नोट्स के लेन-देन से एक रोज का दस्तूर बन गया.हमलोग रोज लंबी-लंबी बातें करते.यूं तो हमारे शहर में ऐसी कोई जगह थी ही नहीं,जहां हम बात कर सकें.हमने शहर के पुराने चर्च का चयन किया और वहीं शाम को लंबी-लंबी बातें करते.मैं उसे फिजिक्स में रौलिंग फ्रिक्सन पढ़ाया करता था.बातों के दरम्यां पता चला की उसके पिता बहुत पहले गुज़र गये हैं और उसकी मां न जाने कितने जतन करके उसे पढ़ा रही हैं.उसकी मां ने उसके न चाहने के बावजूद उसे एक स्मार्टफोन खरीदकर दे दिया था.मुझे ऐसा लगता था की वह अपनी मां के काम में भी हाथ बँटा थी और पढ़ाई भी करती थी.आजकल वह बहुत प्रतिरोध भरी बातें करने लगी थी,ऐसा लग रहा था की आगे चलकर वह जरूर कुछ बदलाव लाएगी.
पर बदलाव अगर घर से शुरू हो तो,उस बदलाव का उम्र अधिक होता है और ठोस भी.अब वह फेसबुक भी चलाने लग गई थी.न जाने कैसे किसी दिन हमारे किसी कुटुम ने हम दोनों को चर्च में देख लिया और आकर मामले को चाचा तक रसीद कर दिया.उस दिन के बाद शाम को हम दोनों का मिलना बंद हो गया था.अब हम दोनों शाम को फेसबुक में घुसकर एक-दूसरे से बातें किया करते.
किचेन से दौड़कर मोबाईल में फेसबुक पर आए नोटिफिकेशन और न्युज फिड को स्क्राल करना ही एकसमय उसके लिए फेमिनिज़्म था.
फिजिक्स में रौलिंग फ्रिक्सन के कंसेप्ट समझना ही उसके लिए उसे अपने आप के मेल काउंटरपार्ट्स को एक कड़ी चुनौती देने भर जैसा था.
सिल्विया प्लाथ की मीरर कविता को बार-बार पढ़ना और अपने आप को तसल्ली देना ही उसके लिए अपना पहला जीवन-विमर्श था.
न जाने क्यों वे फिजिक्स बहुत रूचि से पढ़ति,उस घटना के बाद से और.शायद उसने कुछ अपने आप से वादा कर लिया,जिसे वह मुझसे भी छुपाती रहती.आजकल उसकी बातों से ऐसा लगता की वह सामाजिक रूप से पैठ जमाए सारे ढ़ोंगो से संघर्ष करना चाह रही हो,बस वह सही वक्त़ का इंतजार कर रही हो.
अक्सर हीं रौलिंग फ्रिक्सन के प्रौबलम्स सोल्व करते-करते वह देश के किसी फेमस कॉलेज के बारे में सोचने लगती और एकाएक कहती-
यार! काँलेज लाईफ में कम से कम एक बार हर लड़के को एक बार गर्ल्स हॉस्टल और लड़कियों को एक बार ब्यायज हॉस्टल में एक दिन और रात रहने का मौका जरूर मिलना चाहिए.
यही सोच उसके फ्री और लिबरल होने का एकमात्र पैमाना था जो अभी तक मैं कैद किया हुआ हूँ.
सबकुछ लम्हों मे बित गया और हमारे बोर्ड की परीक्षा भी समाप्त हो गई. एक सप्ताह बाद उसका ए.आई.पी.एम.टी का एग्जाम था,परीक्षा के एक रात पहले उसकी मां ने फोन करके मुझे कहा था की-रवि तुम सेंटर पर इला के साथ चले जाते तो अच्छा रहता.धीमे स्वर मे मैंने कहा था-हां,जरूर चला जाऊंगा. अगली सुबह मैं उसका इंतजार कर रहा था,फन्नी घोष लेन की गली नंबर एक पर.इंतजार थोड़ा अधिक हो रहा था,तो मैंने कयास लगाया कि जरूर इला की मां उसको दही खिला रही होंगी.और जब वह जल्दी से निकलना चाह रही होगी तब उन्होंने उसे कहा होगा कि ज़रा सा और,मैं रोड़ी लेकर आती हूं.
कुछ देर बाद हमदोनों परीक्षा केन्द्र के बाहर थे,आधे घंटे की यात्रा के दरम्यां हमदोनों में एक शब्द का वार्तालाप नही हुआ था.एंट्री गेट के सामने मैंने उसे 'ऑल द बेस्ट' भर बोला था और वह एक मुस्कान देकर चली भर गई थी.जब तीन घंटे बाद इला लौटी तो बस देखती हीं बोली-यार,चार हजार तक रैंक आएगा और इतने रैंक में मुझे कोई सेकंड क्लास का कॉलेज मिल सकेगा।
रास्ते में उसने कहा कि उसने एक कोचिंग सेंटर का एंट्रेस क्लीयर किया है और वह अगले सप्ताह दिल्ली चली जाएगी.पर मैंने उसे बस इतना कह पाया था की-यार,तीन विक बाद बोर्ड एग्ज़ाम के रिजलट्स हैं,उसके बाद तुम चली जाना.
शायद एक सप्ताह तक हमदोनों में कोई बात न हुई थी,फिर एक मुद्दत के बाद हमदोनों वही चर्च में मिले थे.इला ने फिर मुझे बताया था की: उसने मेडिकल और आई.आई.टी. निकलवाने का दावा ठोकने वाले किसी कुक्कुरमुत्ते संस्थान का एंट्रेंस क्लीयर कर लिया था,वैसे ऐसे एंट्रेंस तो वे लोग खूद ही क्लीयर करवा देते हैं.मैंने उसके बहुत समझाया की तुम बिना कोचिंग के भी ए.आई. पी.एम.टी श्योर अच्छे रैंक के साथ क्लीयर कर लोगी.फिर भी वह नही मानी थी,मैंने भी आखिर प्रयास करते हुआ कहा था कि-तुम साउथ दिल्ली की एक कोचिंग मे एडमिशन ले लो,वे लोग तुम्हें फ्री क्लासरूम प्रोग्राम ऑफर करेंगे.याद है की आगे वह काफी झूंझलाती हुई बोली थी-तुम क्या बात करते हो?तुम्हारे यहां सेक्स भी फ्री मे नहीं होते,उसके लिए भी शर्तें हैं,बंदिशे हैं और उसे भी बेचा और खरीदा जाता है.उस समय मुझ कहाँ पता था की सेक्स भी बिकता.
इला ने बताया की वो और अधिक दिन यहाँ नही रेकेगी और परसों वह दिल्ली को चली जाएगी.
इला दिल्ली चली गई थी.फिर भी हमारे बिच फोन से बातें होती रहती थी.इस दरम्यान मेरा एक बार दिल्ली जाना हुआ था,पर मैंने यह बात इला को कभी नही बताया.मुझे लगा था की वह दिवाली में घर जरूर आएगी, पर वह न आ सकी थी.
आने वाले समय में इला की परीक्षाएं भी खत्म हो गई थी और उसे इस बार अच्छे रैंक का पूरा भरोसा था.इला परीक्षा खत्म होने के बाद भी घर न आ सकी थी।
इला के रिजलट्स भी आ गये थे और उसे दिल्ली के एक टॉप कॉलेज में दाखिला भी मिल गया था.
इला ने एक शनिवार मुझे कॉल करके बोली-रवि,तुम मेरी माँ को कुछ दिनों के लिए दिल्ली लेकर आ जाओ.दो दिनों बाद मैं,इला और उसकी माँ की पूरी दुनिया एक साथ थे.कुछ दिनों बाद उसकी माँ लौट आईं थी.
कुछ दिनों बाद इला की क्लासेज़ शुरू हो गई थी.इला की व्यस्तता काफी बढ गई थी और हमदोनों में अब बातें भी कम ही होती थी.पर जब होती,तो बेशक दिल खोल के होती.इला ने मुझे बताया की वह-सिमोन द बोउआर,एलिजाबेथ ब्लैकवेल और मारग्रेट फुलर को पढने लगी है.मैं हैरत में रहता की मेडिकल साईंसेज़ में इन फेमिनिस्ट लेखकों का भला क्या योगदान रहा होगा.जब मैं दिल्ली जाने वाला था तो इला ने मुझे किताबों की लंबी फेहरिस्त बताई थी और मैं उसके लिए कुछ किताबें लेकर भी गया था.पाश की कविताओं की भी इला ने डिमांड की थी.जॉर्ज ओरवैल की 1984 और अमृता प्रितम की कहानियों की एक श्रृंखला भी लेकर मैं गया था.
शायद इला ने जो उस छोटे से शहर में जो सपने देखे थे उसको दिल्ली में पूरा करना चाहती थी.और शायद अब उसका समय आ गया था.
उसकी एक दोस्त ने मुझे बताया था की वह अपने स्मार्ट फोन पर कभी-कभी ऐसी फिल्में भी देखती है जो एकसमय लड़कों की बपौती या कहें की एकाधिपत्य समझा जाता था.उसने बस एक इजारे को तोड़ने भर के लिए दिल्ली के किसी पौश़ इलाके से एक चिल्ड बियर खरीद लायी थी और एक चैलेंज मारकर एक घूंट में हीं डकार गई थी.
वो पिना नही चाहती थी,पर बहुत पुराने समय से चले आ रहे एक मोनोपोली को ब्रेक करना चाहती है.कहने और करने मे कितना अंतर होता है उसे अच्छी तरह मालूम था.मैं तो बस हमेशा कहता भर हूँ और वो कहती नही करती है.मैं तो अपने बनाये सपने को रोज कुचलता हूँ और वो सपना ही नही देखती,शायद सपना खुद चलकर रोज ही उसके हाल को जानने आया करता है.
एक बार मैंने उसे मालाबोरो क्लासिक सिगरेट ऑफर किया था,पर उसने यह कहते हुए इनकार कर दिया था कि उसका मेडिकल सायंस इसे लाईफ के लिए डारमेंट मानता है,फिर मैंने भी यह सोचते हुए अपने आपको रोक पाया था की मालाबोरो चेहरे के शायनिंग को ब्लैक कर देता है.
और उसने जाते-जाते इशारों में कह दिया था की-यू शुड गील ईट अप टू गायज,शायद इसके आगे भी वह कुछ जरूर बोली होगी.पर मैं उसको सुन कहाँ रहा था।
इला के हॉस्टल में बहुत तरह की पाबंदियां थी.लड़कियों को शाम सात बजे के बाद बाहर निकलने की मनाही,क्या पहनना है क्या न,उस पर भी नियंत्रण था.इसी बात को लेकर उसकी कई बार प्रोफेसरों और वार्डन से कहासूनी भी हुई थी.उसकी दोस्त आनंदिका ने मुझे बताया था की-एक प्रोफेसर उसे काफी परेशां भी करते हैं.
पर इला ने इन बातों का जिक्र कभी भी मुझसे नहीं किया था.जब मैं उससे आख़िरी बार मिला था तो वह बहुत खुश थी.एक छोटी बच्ची की तरह चहक रही थी.
मैं तो अपना फोन अक्सर ही साईलेंट मोड में रखता हूँ. एक रविवार जब मैं सुबह उठा तो देखा की इला ने मेरे नंबर पर 21 कॉल्स किये हैं.मैंने कई बार कॉल बैक किया,पर इला का नंबर स्वीच ऑफ बता रहा था.फिर मुझे याद आया की आज तो इला का इसवाँ(21st) जन्मदिन है.
कुछ देर बाद मैंने अपने टी.वी . को ऑन किया तो-उसपर खबरें चल रही थीं,डिप्रेसन से तंग आकर मेडिकल की एक छात्रा ने आत्महत्या कर लिया है.छात्रा का नाम इला है.
मेरी इला चली गई थी,हमेशा के लिए,बहुत दूर.मेरी जिंदगी चली गई थी.मैं अब बस एक ज़िंदा लाश की तरह था.मैं न जिंदा रहना चाहता था न मरना.मैं पानी के उस बुलबचले की तरह रह गया था जो-इस इंतज़ार में रहता है की कब उसे कोई छू ले और वह फूट जाये.