बिहार के सोनपुर में छत्तर का मेला लगता जिसे बहुत लोग एशिया का सबसे बड़ा पशु मेला मानते हैं।हर भेरायटी की गाय,भैंस,हाथी,घोड़ा,कुत्ता।लोगों का मानना है की सबसे निपुण अरबी घोड़ा छत्तर के मेला मे ही आता है।
कोसों दूर से चलकर लोग मेला माकने और देखने आते हैं।मगध,भोजपुर,तिरहुत,मिथिला,यहाँ तक की नेपाल से भी लोग छत्तर आते हैं।
छत्तर मेला पर इतना विश्वास की बहुत लोग तीन-चार महीना बिना गोरस-पाती के गुजार देते हैं,लोगों का आज भी मानना है की छत्तर की गाय का दूध तीन महीना और दूसरे मेला की गाय का दूध आठ महीना खाने के बराबर है।अगर घोड़ा दौड़ कही हो रहा है तो अगर किसी घुड़सवार को पता चल गया की फलाने आदमी का घोड़ा छत्तर से आया है और उसका घोड़ा ऐसे ही कालीचरन छाप मेला का है ,तो वह आदमी आधी बाजी पहले ही हार जाता है।
तो चलिए मैं आपको ले चलता हूँ बहुत साल पहले।
सोनापुर गाँव में बली सिंह नाम के एक आदमी रहते थे,शरीर से एकदम बलिष्ठ,मध्यम कद,सर के आधे बाल सफेद हो गये थे।लोगों का मानना था की बली सिंह ग्यारह साल की उम्र से ही गांजा पी रहे हैं और धत्तूर के बीच का सेवन कर रहे हैं।बली सिंह की पत्नी भी बहुत पहले ही स्वर्ग चली ग ईं।कोई बाल-बच्चा नही।गांजे को ही अपना जीवन मान लिये थे बली सिंह।आँखें हमेशा लाल रहती थी।गांजे का दम लगाने के पहले वह बोला करते थे-
बम भोले कैलाशपति,भाँड़ मे जाये लाखपति,
चिल्लम चढ़े धकाधक,धुँआ उठे फकाफक।गाँव के लोग भी उनको कोई काम का नही मानते थे।सबलोग बली सिंह को फालतू ही समझते थे।पर उनकी एक जगह पूछ सभी लोग करते थे,जिन्हे भी दुधारू पशु लेना है,वे बिना बली सिंह से पूछे नही लेते थे।लोगों का मानना है की एक कोश दूर से ही किसी जानवर को देखकर बली सिंह,उसके गुणों और अवगुणों को बता देते थे।
मने,बली सिंह जानवर पसंद करने के मामले मे एकदम टेका आदमी।छत्तर मेला के समय मे बली सिंह,बली बाबू हो जाते थे।
एक बार बली सिंह अपने ही गाँव के धनाठ आदमी धनेश्वर बाबू के साथ,धनेश्वर बाबू के लिए जर्सी गाय पसंद करने छत्तर गये।पूरा मेला का चार चक्कर माकने बाद गाय मिल ग ई।मेला मालिक के मुंशी से करारनामा बनवाया गया।फिर बली बाबू ने नेपाल से आये नागा साधुओं के साथ गुड़ की जलेबी के साथ नेपाली गांजे का कश लगाया।
बेर गिरने पर था,मेला से लोग चल दिए।गाय का पगहा धरे धनेश्वर सिंह का आदमी आगे बढ़ रहा था।पीछे-पीछे बली बाबू और धनेश्वर बाबू थे।करीब पाँच कोस जमीन चलने के बाद एक नदी पार करना पड़ता है,अंधेरा भी हो गया था।रास्ते मे क ई आदमी ने टोका भी था की अंधेरा होने पर नदी मत पार करियेगा।लोगों का मानना है की नदी के पास जो पीपल का पेड़ है,उसपर एक प्रेत के परिवार का वास है।
किसी पार करने वाले को नही छोड़ता है।पानी मे डूबा-डूबाकर अधमरा कर देता है और फिर साँप के कोड़े से मार-मारकर सीधे परलोक भेज देता है।लोगों का मानना है की हर मरने वाला भुतों के परिवार का सदस्य बन जाता है।
पर बली सिंह तो ठहरे अपने ही किस्म के आदमी।धोती को चार बित्ता ऊपर उठाये और चभ्भ से पानी मे हेल गये।पानी मे चार डेग ही आगे बढ़े की पीपल के पेड़ से चभाक चभाक किसी के कूदने का आवाज आया।
बली सिंह एकदम आवाक रह गये,गांजे का नशा एकदम से क्षण भर मे ही टूट गया।
बली बाबू चारो तरफ से घीरे हुए थे।भुतों के पैर उल्टे थे और हाथ खजूर के पेड़ की तरह।कोई भूत बली सिंह से गांजा माँगता,तो कोई रामपुरिया खैनी।
अंतिम मे जाकर बात खैनी पर सलटा और बालदेव सिंह की जान बची।
तब से आजतक जो भी अंधेरे में नदी पार करता है,उससे पहले वह एक किल्ली खैनी पीपल के पेड़ के नीचे रख देता है।
इस तरह फालतू समझे जाने वाले बली सिंह की भी कहानी अमर हो ग ई।
Monday, 22 February 2016
चूना खैनी वाला भूत का परिवार
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