कभी-कभी हरियाली भी बस दिखावे भर के लिए होती है।जब हरियाली हीं संकट और हताशा का प्रतिक बन जाये,हरियाली होने पर भी जब लोग मातम मनायें,तो सोचिए वह कितना कल्पनातीत होगा।
हरियाली तो है,पर पता है की ये हरियाली 15 दिन बाद चली जायेगी और एक ऐसी स्थिति दे जायेगी जिससे बाहर आना अत्यंत मुश्किल हो जायेगा।
जेठ खत्म होते हीं किसान आकाश की ओर टकटकी लगाकर देखने लगते हैं,तरह-तरह की आशंकायें व्यक्त की जाती है,वर्षा में देरी होने पर गाँव के बुजुर्गों पर चुपके से कीचङ फेंके जाते हैं,मेढक की शादि कराई जाती है।
फिर एक दिन, रात भर जमकर वर्षा होती है।
अगली सुबह छोटे किसान या कहें की दिल्ली,बंब ई,सूरत से कुछ पैसे कमाकर लौटे भूमिहीन गाँव के बङे किसान के दलान-द्वार पर हाजिर।
हाजिर,खेत लेने के लिए साल भर के लिए।पट्टा पर,अध ईया पर,मनी पर।आज भी कोई मजदूर कहलाना नहीं चाहता,दिल्ली-सूरत जाकर मजदूर बनने से अच्छा की बीघे,दो बीघे की खेती हीं कर ली जाए।
फिर शुरू होता है संघर्ष,भादव भी आ गया,पर बारिश नहीं हुई।काले बादल तो रोज हीं दिखते हैं आकाश में पर बरशते हीं नहीं।ये काले बादल हीं तो छोटे किसानों,मजदूर लोगों के जीवन के काल का प्रतिक होते हैं।
सरकार की तरफ से सिंचाई की कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं,अफसर के पास जाओ तो ,वे अपनी जेब गर्म करने के फेर में।कोई वैकल्पिक सहायता नहीं।
खेत में धान के पौधे तो हैं,पर यें आने वाले पंद्रह दिनों में पीले पङ जायेंगे और फिर किसान भी पीले पङ जायेंगे।
जहाँ कोई आशा नहीं है,बस सोचना है की जीना है या मरना है या मर कर जीना है।
ये है हमारे महान राष्ट्र के सौतेले संतान,छोटे,मध्यमवर्गीय किसानों की कहानी।
Tuesday, 3 November 2015
सौतेली संताने-छोटे किसान।
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